उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसम्यङ्मतिप्रकरणम् १५३ असदिति-ये तीनों (नाम, रूप, कर्म) कल्पित (मिथ्या) हैं, क्योंकि इन तीनों की कल्पना, परस्पर एक दूसरे से की जाती है। जैसे शब्द के द्वारा श्रुत तथा बुद्धिपूर्वक बाहर भित्ती आदि पर लिखे हुए वर्ण मिथ्या होते हैं॥ ११॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में सम्पूर्ण प्रपञ्च को समग्र रूप से 'नाम, रूप, और कर्म'-इस प्रकार त्रिविध बताया। इन तीनों की परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा से कल्पना की जाती है, उस कारण ये मिथ्या हैं। जिस प्रकार शब्द द्वारा सुने गये वर्ण अर्थात् इन्द्रादि रूपविशेष सहस्राक्ष, वज्रबाहुत्व आदि की अपनी बुद्धि से कल्पना कर बाहर भित्ति आदि पर काढ़े हुए वर्ण की तरह कल्पित मिथ्या होते हैं। निष्कर्ष यह है कि जब हम चित्र में किसी देवता आदि का (सहस्राक्ष- वज्रबाहु वाला) रूपविशेष देखते हैं, वैसा ही वास्तविक रूप इन्द्र का नहीं रहता है। अतः शब्द, मिथ्या अर्थ को बताता है॥ ११॥ दृष्टं चापि यथा रूपं बुद्धेः शब्दाय कल्पते। एवमेतज्जगत्सर्वं भ्रान्तिबुद्धिविकल्पितम् ॥१२॥ दृष्टमिति-जिस प्रकार चित्र में किसी देवता आदि का रूप देखते हैं, तब वह देखा हुआ (दृष्ट) रूप, 'यह राम, कृष्ण' आदि देवता का ज्ञान (बुद्धि) उत्पन्न कराता है, और वह ज्ञान शब्दव्यवहार का कारण बन जाता है, किन्तु वह कल्पनाजनित होने के कारण मिथ्या ही है। उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् भ्रान्त बुद्धि के द्वारा ही कल्पित हैं, अतः भ्रमजनित होने के कारण मिथ्या ही है॥ १२॥ हृदयस्पर्शिनी शब्द से मिथ्या अर्थकल्पना को बताकर अब मिथ्या अर्थ से शब्दकल्पना को बताते हैं। किसी भित्ति पर या कपड़े पर चित्रित किये गये देवता रूप को देखने से संस्कृत हुई बुद्धि में ठीक उसी तरह वह रूप समा जाता है और तदनुसार शब्दव्यवहार किया जाता है। उसी तरह यह सम्पूर्ण जगत् भ्रान्त बुद्धि से कल्पित हुआ है। जैसे भ्रान्त बुद्धि से (मिथ्या ज्ञान से) शुक्ति में रजत की कल्पना की जाती है, वैसे ही आत्मा में विविध नाम-रूप-कर्मात्मक जगत् की भ्रान्त बुद्धि से (मिथ्या ज्ञान से) कल्पना की गई है, वस्तुतः वह 'सत्' नहीं है॥ १२॥ असदेतत्ततो युक्तं *संविन्मात्रं न कल्पितम्। वेदश्चापि स एवाद्यो वेद्यं चान्यत्तु कल्पितम् ॥१३॥ असदिति-अतः इस प्रपञ्च को मिथ्या कहना उचित ही है। केवल सत्-चित् स्वरूप आत्मा ही ऐसा है, जो कल्पित नहीं है। उसी तरह पूर्वसिद्ध आत्मा ही वेद है जो ज्ञान का हेतुभूत है। और वही वेद्य (ज्ञेय) है, उसके अतिरिक्त सभी कल्पित है। अतः सब मिथ्या है। ज्ञान के हेतुभूत श्रुति (वेद) और आचार्य भी आत्मस्वरूप ही हैं। क्योंकि आत्मा के अतिरिक्त अनात्म (जड़) पदार्थों में अर्थ को प्रकट करने की शक्ति नहीं होती॥ १३॥ हृदयस्पर्शिनी जगत् को मिथ्या सिद्ध कर देने पर यही कहना होगा कि सभी यदि कल्पित हैं तो बौद्धों के शून्यवाद में और सभी को कल्पित कहने में अन्तर ही क्या रहा ? इस शंका के उत्तर में बता रहे हैं कि बिना अधिष्ठान (निरधि- ष्ठान) कल्पना नहीं होती। समस्त कल्पनाओं के करने योग्य अधिष्ठान सचिन्मात्र (प्रत्यक् तत्त्व) है, वह सब का साक्षी होने से समस्त कल्पनाओं के पूर्व से ही सिद्ध है, अतः वही एकमात्र कल्पित नहीं है। किन्तु पुनः शंका होती है कि आत्मतत्त्वज्ञान के हेतुभूत वेद और आचार्य भी कल्पित नहीं हैं, तब सचिन्मात्र को ही अकल्पित कैसे कहा गया ? सचिन्त्स्वरूप आत्मा कल्पित नहीं और पूर्वसिद्ध आत्मा ही वेद और वेद्य भी है। वही श्रुति तथा आचार्य के रूप में माया के द्वारा प्रकट किया जाता है क्योंकि अर्थप्रकाशन की शक्ति का होना जड़ पदार्थ में कभी संभव नहीं। अग्नि की प्रकाशन शक्ति से भिन्न कोई अन्य (अपर) प्रकाशनशक्ति दीपक की नहीं हुआ करती। आत्मतत्त्व ही एकमात्र वेद्य है, वही पूर्वसिद्ध है। उसके अतिरिक्त जो भी विशेष है, वह सभी कल्पित है। तथाच कल्पित विशेष का अनुगत
- सच्चिन्मात्रं०-पाठान्तरम्। २०