उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ उपदेशसहस्री उच्यते१॥” मन और इन्द्रियों की एकाग्रता को ही परम तप कहते हैं। वह समस्त धर्मों से उत्कृष्ट है और उसी को परम धर्म कहते हैं। श्रुत्युक्त वस्तु में मनन द्वारा चित्त की स्थिरता को ही एकाग्र (एकाग्रता) कहते हैं। उसकी अवश्यकर्तव्यता के बोधनार्थ ‘तज्ज्याय:’ कहकर उसकी प्रशंसा की गई है ॥ २४ ॥ दृष्टं जागरितं विद्यात्स्मृतं स्वप्नं तदेव तु । सुषुप्तं तदभावं च स्वस्वात्मानं परं पदम् ॥२५॥ दृष्टमिति—बाह्य इन्द्रियों से जो दिखाई देता है, उ से जाग्रत् समझना चाहिये, उसी को स्मरण किये जाने पर उसे स्वप्न कहना चाहिये, और उसके अभाव को सुषुप्ति कहते हैं। उक्त तीनों अवस्थाओं के साक्षीस्वरूप आत्मा को परमपद (सत्य-ज्ञानादिलक्षण) 'मैं ब्रह्म हूँ'—यह समझना चाहिये ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त साधनों से निर्मलचित्त (शुद्धचित्त) हुआ मुमुक्षु, श्रवणादि में तत्पर होकर तीनों अवस्थाओं से उनके साक्षी को पृथक् समझ कर वेदान्तवाक्य से अपने को ब्रह्मरूप समझे। बाह्य इन्द्रियों से जो कुछ देखा जाता है अर्थात् बाह्यार्थ की उपलब्धि की जाती है, उसे जागरित (जाग्रत्) अवस्था समझो। वही; जो ‘दृष्ट’ शब्द से वाच्य है, उसीको स्मरण किये जानेपर स्वप्न कहते हैं, अर्थात् संस्कारवशात् निद्रा-दशा में जिसका भान होता है, उसे स्वप्न समझो । और उस दृष्ट तथा स्मृत का अभाव जिसमें हो, उसे सुषुप्त समझो। इस प्रकार तीनों दृश्यों को पृथक् कर उस (दृश्य) के साक्षी स्वयं स्वरूपभूत आत्मा को ही परम पद अर्थात् सत्यज्ञानादिलक्षण परब्रह्म समझो अर्थात् ‘अहं ब्रह्मास्मि’ मैं ब्रह्म हूँ—ऐसा समझो ॥ २५ ॥ सुषु*प्ताख्यं तमोऽज्ञानं बीजं स्वप्नप्रबोधयोः । स्वात्मबोधप्रदग्धं स्याद्बीजं दग्धं यथाऽभवम् ॥२६॥ सुषुप्ताख्यमिति—सुषुप्तिसंज्ञक तम को ही अज्ञान कहते हैं। वही स्वप्न और जाग्रत् (प्रबोध) का मूल कारण है। उसका आत्मज्ञान (स्वात्मबोध) के द्वारा जब दाह हो जाता है, तब जले हुए बीज के समान वह फलो- त्पादक नहीं होता ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अवस्थात्रय के हेतुभूत अज्ञान के रहते तद्विविक्ततया प्रत्यगात्मा में ब्रह्मत्व कैसे उपपन्न हो सकता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि सुषुप्तिसंज्ञक जो तम है, वही अज्ञान है। वह स्वप्न और जाग्रत् का मूल अर्थात् उपादान (बीज) कारण है। आत्मज्ञानरूप अग्नि से उस अज्ञानरूप बीज का जब दाह हो जाता है, तब वह दग्ध हुए बीज के समान फल को पैदा नहीं कर पाता। अज्ञान में ‘तम’ को विशेषण कहने से अज्ञान की भावरूपता बताई गई है। भावरूप होनेपर ही उसमें बीजत्व उपपन्न हो सकता है। जैसे दग्ध बीज अभव अर्थात् भवशून्य यानी कार्योत्पादक नहीं होता, वैसे ही तत्त्वज्ञानाग्नि से दग्ध हुआ ज्ञान पुनः अवस्थाप्ररोहकर नहीं होता, उस कारण प्रत्यगात्मा का ब्रह्मत्व कथन उचित ही है ॥ २६ ॥ परंपरया वा विहितफलसाधनयागशरीरं निष्पाद्य तद्द्वारा तदुत्पत्त्यपूर्वोपयोगीनि,—तानि सन्निपत्योपकारकाणि अङ्गानि । सन्निपत्य—द्रव्यादिद्वारेण यागशरीरघटकीभूय, उपकारकाणि यागापूर्वोपयोगीनीत्यर्थः । और ‘आत्मसमवेतापूर्वजनकानि आरादुपकारकाणि अङ्गानि । आरात्—दूरे स्थित्वा यागशरीरमप्राप्येति यावत्, उपकारकाणि स्वापूर्वद्वारा यागापूर्वो- पयोगीनीत्यर्थः । अत्र सन्निपत्य = साक्षात्, आरात् = परम्परया । १. (मोक्ष धर्म २५०।४, वन प. २६०।२५ )
- पत्या०—पाठान्तरम् ।