उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वमसिप्रकरणम् १९३ हृदयस्पर्शिनी तथापि 'शब्द' का प्रमेय होनेसे 'आत्मा' को स्वतःसिद्ध नहीं कह सकते । अर्थात् अहम्प्रत्यय जो होता है, वह आत्मविषयक न होकर अन्यविषयक है। इसी प्रकरण के २४ वे श्लोक 'संभाव्यो गोचरे शब्दः' से आत्मा को प्रत्यय का अविषय होना बताया गया है । अब इस श्लोक से बता रहे हैं कि वह 'शब्द' का भी विषय नहीं होता, 'शब्द' का विषय भी कोई अन्य ही होता है । जाति, कर्म आदि शब्दों की प्रवृत्ति होने में निमित्त 'साभास अहंकार' है, अतः 'शब्द' का विषय साभास अहंकार है अर्थात् आभास-विशिष्ट अहंकार है। एवंच शब्द का प्रमेय विशिष्ट रहने पर भी केवल शुद्ध आत्मा, शब्द का विषय न होने से वह (आत्मा) स्वतःसिद्ध है। उस निरुपाधिक आत्मा में कोई भी शब्द, प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि जाति, कर्मादि शब्दों की प्रवृत्ति में निमित्त तो साभास अन्तःकरण अर्थात् विशिष्ट अन्तःकरण (अहंकार) होता है। अतः आत्मा, किसी शब्द के द्वारा सिद्ध नहीं है, अपितु स्वतःसिद्ध है ॥ २८ ॥ आभासो यत्र तत्रैव शब्दाः प्रत्यग्दृशि स्थिताः । लक्षयेयुर्न साक्षात्तमभिदध्युः कथंचन ॥२९॥ आभास इति—'आत्मा' को किसी शब्द के द्वारा नहीं बताया जा सकता, क्योंकि वह अनिर्देश्य है । तब वेदान्तवाक्य भी उसको कैसे बता पायेंगे ? क्योंकि वे वाक्य भी शब्दरूप ही हैं। इस जिज्ञासा का समाधान यह है कि जहाँ अहंकारादि में चैतन्य का प्रतिबिम्ब स्फुरित होता है, वहीं पर रहनेवाले आत्मादि शब्द उस प्रत्यगात्मा को लक्षित कराते हैं। वे शब्द किसी भी प्रकार से उसका साक्षात् प्रतिपादन नहीं करते ॥ २९ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त कथनानुसार तो स्वरूपभूत शुद्ध केवल आत्मा में प्रवृत्तिनिमित्त जाति आदि के अभाव के कारण किसी शब्द की प्रवृत्ति न होने से तो वेदान्तवाक्य भी उसका बोध नहीं करा पायेंगे । क्योंकि वेदान्तवाक्य भी शब्दरूप ही हैं। ऐसी स्थिति में उस आत्मा को वेदान्तवेद्य या औपनिषद कैसे कह सकते हैं? इसका समाधान यह है कि जब अहंकारादि में आभास अर्थात् चैतन्य का प्रतिबिम्ब स्फुरित होता है, तब वह प्रतिबिम्बित आत्मा (चैतन्य) और अन्तःकरण दोनों एकाकार (अविविक्त, अपृथक्) हुए से ज्ञात होते हैं। उसी को लोग 'आत्मा' शब्द से कहा करते हैं । अर्थात् आत्मादि शब्द उसी के वाचक होते हैं और प्रत्यक्तया भासमान जो 'दृशि' अर्थात् शुद्ध आत्मा है, उसे वे आत्मादि शब्द लक्षणा के द्वारा ज्ञापित करते हैं, उसे साक्षात् अभिधा से नहीं बताते । अतः आत्मा को औपनिषद कहने में कोई विरोध नहीं है ॥ २९ ॥ न ह्यजात्यादिमान्कश्चिदर्थः शब्देनिरूप्यते ॥३०॥ नेति—क्योंकि जाति आदि से रहित किसी भी पदार्थ को शब्द नहीं बता सकते ॥ ३० ॥ हृदयस्पर्शिनी क्योंकि किसी भी जाति आदि से शून्य (रहित) वस्तु का शब्द से प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ॥ ३० ॥ आत्माभासो यथाऽहंकृदात्मशब्दैस्तथोच्यते । उल्मुकादौ यथान्यर्थाः परार्थत्वान्न चाञ्जसा ॥३१॥ आत्मेति—आत्मा के समान 'अहंकार' की प्रतीति जैसे होती है, उसी तरह 'आत्मा' आदि शब्दों के द्वारा उसको बताया भी जाता है । अग्नि के कार्यरूप 'दाह' आदि का प्रयोग जैसे 'उल्मुक' (अंगार) में किया जाता है । क्योंकि वे दाह आदि परार्थ (अन्यन्यर्थक) हैं, अतः उनका प्रयोग उल्मुक आदि में साक्षात् नहीं किया जाता ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा यदि अहंकार से अतिरिक्त हो तो लक्षणा के द्वारा वेदान्तवाक्य उसको बता पायेंगे, तब अहंकार में आत्मशब्द का प्रयोग लोग कैसे कर सकते हैं ? लक्षणा से भी जहाँ शब्द का तात्पर्य होता है, वहीं शब्द का अर्थ माना जाता है । जिस प्रकार अहंकार आत्मा के तुल्य प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मादि शब्दों के द्वारा उसका प्रतिपादन भी २५