भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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( xvii ) जाय, वह वास्तविक ज्ञान का विषय नहीं हो सकता। अतः उसे अज्ञान या माया या अविद्या नाम से कह दिया जाता है। वस्तुतः हम अपने को मोह में पड़ने देते हैं अतः हम ही मोहक हैं पर लगता है कि कोई और हमें भेद में डाल रहा है। इस मोह को भंग करना ही जीवन का लक्ष्य है। विट्जेन्स्टाइन कहता है कि दर्शन हमारे बुद्धि के मोह को भंग करने का युद्ध मात्र है ( a battle against the bewitchment of our intelligence ) । जिनका यह मोह भंग हो गया है, वे ही अद्वैत सिद्धान्त के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आत्मज्ञानी शोक-मोह से परे हो जाता है। ‘श्रुतिस्तत्त्वमसीत्याह श्रौतुर्मोहापनुत्तये ( उ० सा० तत्त्वमसि० ९९ ) । अद्वैत उस आत्मज्ञान को प्राप्त करना ही मानव-जीवन का लक्ष्य मानता है। कई आचार्य तो समग्र सृष्टि-प्रक्रिया को भी इसी उद्देश्य के लिये ही स्वीकारते हैं। शिव और जीव को अलग करने वाला सकारण प्रपञ्च ही है। प्रपञ्च की सकारण उपशान्ति ( प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम् ) ही जीव के काल्पनिक भेद को निवृत्त कर उसे शिवस्थिति का बोध करा देती है और यह श्रवण के द्वारा ही सम्भव है। इस प्रकार उपदेशसाहस्री किसी भी मोक्षमार्ग के पथिक के लिए दृढ़ सम्बल है। इस एक ही ग्रन्थ को भली प्रकार विचारपूर्वक समझ कर तदनुकूल साधना करने से साधक निश्चित् ही अपने लक्ष्य पर पहुँच जायगा। वर्त्तमानकाल में संस्कृत का पठन-पाठन विरल होता जा रहा है। यद्यपि यह सत्य है कि संस्कृत में दार्शनिक विषय को स्पष्ट करने की जो सामर्थ्य है, वह अभी हिन्दी में नहीं आ पायी है। परन्तु इतने मात्र से असंस्कृतज्ञ को वेदान्त के प्रवेश से वंचित रखना उपयुक्त न समझ कर गत दो सौ वर्षों से हिन्दी में उत्कृष्ट वेदान्त ग्रन्थों की रचना की परम्परा प्रारम्भ करने में संन्यासी अग्रगामी बने । 'महेश अनुसन्धान' इसी कड़ी में आगे बढ़ रहा है। हम उसके संचालक व प्रबन्धकों को आशीर्वाद देते हैं कि वे स्वयं भी पूर्ण निष्ठा प्राप्त कर सकें व इस प्रकार के ग्रन्थों को अनूदित करके जनसामान्य को इस भीषण काल में वेदान्त की ओर प्रवृत्त कर उन्हें शान्ति देने में समर्थ हो सकें। जनता से भी अनुरोध है कि जीवन में प्रतिदिन न्यूनतम २४ मिनट ( १ घड़ी ) अर्थात् १/६० या षष्ट्यंश वेदान्त-ग्रंथों के स्वाध्याय में लगावें। सर्वज्ञ शङ्कर की भाषा व युक्ति इतनी सरल व जीवन में व्यावहारिक है कि कल्याण हुए बिना रह ही नहीं सकता। उमामहेश्वर से प्रार्थना है कि यह ग्रन्थ भारत के अशान्त वातावरण में सभी को शान्ति पहुँचा कर सफल हो। शङ्कर मठ भगवत्पादीयो अर्बुदाचल महेशानन्दगिरिः