भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

२०८ | उपदेशसाहस्री तस्माज्ज्ञाभासबुद्धीनामविवेकात्प्रवर्तितः । जानातीत्यादिशब्दश्च प्रत्ययो या च तत्स्मृतिः ॥६९॥ तस्मादिति-अतः यह निश्चित रूप से समझना होगा कि 'चेतन' (ज्ञ), चिदाभास, और बुद्धि इन तीनों का विवेक न हो पाने से ही 'जानाति' इत्यादि शब्द, तद्विषयक ज्ञान, और उसकी स्मृति हुआ करती हैं ॥ ६९ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसलिये चेतन, चिदाभास, बुद्धि इन तीनों के अविवेक के कारण ही 'जानाति' आदि शब्द, तद्विषयक ज्ञान, और उसकी स्मृति की प्रवृत्ति हुई है। आत्मा की जो कूटस्थता है, वह प्रमाण से सिद्ध है। किन्तु उसका विकारित्व प्रमाण से सिद्ध नहीं है। जब कि ज्ञान में आत्मस्वरूपता का श्रवण होता है, अतः वह तो नित्य ही है। उसे किसी के द्वारा उत्पन्न नहीं किया जाता । बुद्धिसंसर्ग हुए बिना आत्मा में ज्ञातृत्व की उपलब्धि नहीं हो पाती, क्योंकि सुषुप्ति में ज्ञातृत्व की उपलब्धि नहीं होती है। बुद्धि की उपलब्धि भी आत्मा से भिन्न आकार में नहीं होतो। इस कारण आत्मा, बुद्धि, तत्स्थ आभास इन तीनों का विवेकग्रह न होने से यथाप्रसिद्ध बुद्धि और आत्मा के व्यावहारिक एकत्व का ग्रहण कर 'जानाति' आदि शब्दों का व्यवहार उपपन्न होता है । कोई भी अन्य आलम्बन परमार्थतः मुख्य नहीं है ॥ ६९ ॥ आदर्शानुविधायित्वं छायाया अस्यते मुखे । बुद्धिधर्मानुकारित्वं ज्ञभासस्य तथेष्यते ॥७०॥ आदर्शोति - मुखाभास में दर्पण का अनुविधायित्व रहता है और उसका मुख में आरोप करते हैं, वैसे ही बुद्धि के धर्मों का अनुकरण करने वाला जो चिदाभास है, उसका चेतन में आरोप किया जाता है ॥ ७० ॥ हृदयस्पर्शिनी ज्ञ, आभास और बुद्धि के अविवेक से जो समस्त व्यवहार चलता है, वह पारमार्थिक नहीं है, इसे दृष्टान्त के द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं- जिस प्रकार छाया में (मुखाभास अर्थात् प्रतिबिम्ब में) दर्पण का अनुवर्तन रहता है, उसी का मुख में आरोप किया जाता है। उसी प्रकार बुद्धि के धर्मों का अनुकरण करने वाले अध्यस्त चिदाभास को भी चेतन में अध्यस्त मानकर व्यवहार किया जाता है ॥ ७० ॥ बुद्धेस्तु प्रत्ययास्तस्मादात्माभासेन दीपिताः । ग्राहका इव भान्ते दहन्तीवोल्मुकादयः ॥७१॥ बुद्धेरिति-अग्नि से व्याप्त हुआ अंगार, दाहक के रूप में प्रतीत होता है, उसी प्रकार चिदाभास से प्रकाशित होने वाले बुद्धि के प्रत्यय, प्रकाशकर्ता के रूप में जान पड़ते हैं ॥ ७१ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार उल्मुक (जलती हुई लकड़ी, अंगार) आदि अग्नि से व्याप्त होने के कारण जलाते हुए से प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार चिदाभास के द्वारा प्रकाशित हुए बुद्धि के परिणामरूप प्रत्यय प्रकाशकर्ता की तरह प्रतीत होते हैं ॥ ७१ ॥ स्वयमेवावभास्यन्ते ग्राहकाः स्वयमेव च । इत्येवं ग्राहकास्तित्वं प्रतिषेधन्ति सौगताः ॥७२॥ स्वयमिति-ग्राहक (ज्ञान) स्वयं ही प्रकाशित होते हैं और वे स्वयं ही प्रकाशरूप हैं-यह कहनेवाले बौद्ध विद्वान् प्रत्यय (ज्ञान) के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकाशक के अस्तित्व (सत्ता) का निषेध करते हैं ॥ ७२ ॥ हृदयस्पर्शिनी आभास से विविक्त (पृथक्) पदार्थ के स्वरूप का ज्ञान न होने से जैसे तार्किकों को व्यामोह होकर वे 'ज्ञानं क्रियते' कहते हैं, उसी प्रकार बौद्धों को भी 'बुद्धि से व्यतिरिक्त (पृथक्) अन्य कोई ग्राहक नहीं है', इस प्रकार का व्यामोह