भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २१७ शरीरादि अनात्मा को ही प्रधान समझते हैं, इसलिए उनकी दृष्टि में आत्मा ही अनात्मा का विशेषण है। अतः अध्या- रोपापवादन्याय से यथाप्रतीति सत्ता को लेकर विवेकियों की आत्मविषयक बुद्धि कराने के लिये विशेषण-विशेष्यादि प्रबन्ध कल्पना की गई है ।। ९५ ।। अन्वयव्यतिरेकौ हि पदार्थस्य पदस्य च । स्यादेतदहमित्यत्र युक्तिरेवावधारणे ।।९६।। अन्वयेति—आत्मानात्मरूप पदार्थ तथा पद के अन्वय-व्यतिरेक, ये 'अहम्' इस वस्तु की अवधारणा (निश्चय) करने में युक्ति मात्र हैं ।। ९६ ।। हृदयस्पर्शिनो पद-पदार्थ के अन्वय-व्यतिरेक से ही सर्वसंसारविनिर्मुक्त आत्मा का ज्ञान हो ही जायगा, तब वाक्य की क्या आवश्यकता ? पदार्थ का अन्वय-व्यतिरेक इस प्रकार है—आत्मपदार्थ सबका द्रष्टा (साक्षी) है, वह कभी भी दृश्य अथवा साक्ष्य नहीं होता, क्योंकि वह अलुप्तप्रकाशसन्मात्र होने से स्वयंप्रकाश है। अतः अन्याश्रय न होने से कभी भी और किसी का भी विशेषण होकर वह नहीं रहता। तथा अहंकार से लेकर उनके अपने विषयों तक सब साक्ष्य (साक्षीभास्य) हैं, उनका प्रकाश अन्याधीन होने से अन्याश्रय है अर्थात् अन्याश्रित है। इसलिए अप्रधान होने के कारण वह अहंकारादि विषयान्तपदार्थ सर्वदा आत्मा का विशेषण होकर ही रहता है। तस्मात् अनागमापायी वह दृगात्मरूप (आत्मा) शुक्ति के समान सत्य है। और उससे विपरीत जो भी अतिरिक्त पदार्थ है, वह सभी रजत के समान असत्य हैं और अनृत, जड़, परिच्छिन्न, पराधीन, पराक् अर्थ से व्यावृत्त (भिन्न) सत्य, ज्ञान, अनन्त, प्रत्यक्, आनन्दरूप 'आत्मा' है, इस प्रकार से पराक् और प्रत्यक् का विवेचन करना ही पदार्थ का अन्वय-व्यतिरेक कहा जाता है। 'तथा' पद का अन्वय-व्यतिरेक इस प्रकार है—आत्मा, चैतन्य, प्रज्ञान, ब्रह्म, सत् आदि पद, कर्ता आदि उपपदों से रहित रहते हैं, तब वे शुद्ध आत्मा के बोधक होते हैं। इसीलिए किसी के विशेषण न होने से वे तद्विशिष्ट किसी अन्य वस्तु का ज्ञान (बोध) नहीं करा सकते। क्योंकि विशिष्ट का बोधन कराने की सामर्थ्य उन शब्दों में नहीं है। किन्तु कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता, द्रष्टा, श्रोता, वक्ता, गन्ता, कृश, स्थूल-ये शब्द (पद) देहेन्द्रियादिविशिष्ट आत्मा के बोधक हुआ करते हैं, शुद्ध आत्मा के बोधक नहीं होते हैं। क्योंकि इन शब्दों का प्रयोग, अन्य के अधीन क्रिया आदि की उपरागदशा में ही हुआ करता है। इस प्रकार के विवेचन को ही पद का अन्वय-व्यतिरेक कहा करते हैं। इस रीति से पद और उसके अर्थों के अन्वय-व्यतिरेक को समझ लेने से ही आत्मज्ञान सहज हो सकता है, तब वाक्य की क्या आवश्यकता ? इस प्रकार पद या पदार्थ का जो अन्वय-व्यतिरेक है, वह तो अस्मदर्थ विषय के अवधारण करने में युक्ति- रूप ही है, अर्थात् विवेकावधारण का उपायमात्र है; वाक्यार्थ की एकता में, पदार्थ की एकता में उसका व्यापार नहीं है। तस्मात् इतने विवेक से आत्मा का देहादि से वैलक्षण्य का अवधारण हो जाने पर भी 'मैं कौन हूँ' यह जिज्ञासा बनी ही रहती है। 'तत्त्वमसि' यह वाक्य जिज्ञासित स्वरूपविशेष का समर्पक है, अतः उसकी अपेक्षा तो अवश्य ही करनी होगी ।। ९६ ।। नाद्राक्षमहमित्यस्मिन्सुषुप्तेऽन्यन्मनागपि । न वारयति दृष्टिं स्वां प्रत्ययं तु निषेधति ॥९७॥ नाद्राक्षमिति—इस सुषुप्ति की स्थिति में 'अन्यत् मनागपि अहम् नाद्राक्षम्'—मैंने कुछ भी अन्य वस्तु नहीं देखी—यह जो अनुभव है, वह अपनी दृष्टि का निषेध नहीं कर रहा है, वह केवल प्रत्यय का ही निषेध करता है, अर्थात् प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयात्मक त्रिपुटी का ही निषेध करता है ।। ९७ ।। हृदयस्पर्शिनो तीन अवस्थाएँ परस्पर व्यभिचारी हैं, किन्तु चैतन्यात्मा कदापि व्यभिचारी नहीं है, इस प्रकार प्रकारान्तर से आत्मानात्म-विवेक को बताते हैं। इस सुषुप्त में (इस आत्मा में) या इस सुषुप्ति अवस्था में 'आत्मस्वरूप के २८