उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वमसिप्रकरणम् २१९ हृदयस्पर्शिनी वाक्यश्रवणमात्र से मोह के अपोहन में पुराणसिद्ध दृष्टान्त को बता रहे हैं। दाशरथी राम ने देवकार्य संपादन करने के लिये मनुष्यावतार के अभिनय द्वारा संकल्प पूर्वक अपने माहात्म्य का आच्छादन जो किया था, उसे ही यहाँ पर अज्ञान (तमस्) शब्द से कहा गया है। क्योंकि परमेश्वर को संमोह होना संभव नहीं है। संक्षेपशारीरक में कहा गया है- “संकल्पपूर्वकमभूद् रघुनन्दनस्य नाहं विजान इति कांचन कालमेतत् । ब्रह्मोपदेशमुपलभ्य निमित्तमात्रं तच्चोत्ससर्ज स कृते सति देवकार्ये”॥ ब्रह्मदेव ने 'हे राम ! तुम विष्णु हो, केवल दशरथपुत्र नहीं हो।' इस वाक्य के द्वारा ही दशरथकुमार राम का अज्ञान निवृत्त कर दिया था। ब्रह्मा ने उनके विष्णुत्व का बोध कराने में उक्त वाक्यार्थ का उपदेश करने के अतिरिक्त कोई अन्य प्रयत्न नहीं किया था ॥ १०० ॥ अहंशब्दस्य निष्ठा या ज्योतिषि प्रत्यगात्मनि । सैवोक्ता सदसीत्येवं फलं तत्र विमुक्तता ॥१०१॥ अह्मिति—उसी प्रकार 'अहम्' शब्द की जो निष्ठा है, उसी का 'तू सत्स्वरूप है'—इस वाक्य के द्वारा उपदेश किया गया है और उसका फल 'मोक्ष' है ॥ १०१ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसी प्रकार पराक् (बाह्य) अर्थों से व्यावृत्त निरुपाधिक ज्योतिःस्वरूप, साक्षित्वप्रकाशस्वभाव प्रत्यगात्मा में 'अहं' शब्द की जो निष्ठा है, अर्थात् 'अहं' शब्द से जो स्वयंप्रकाश सर्वसाक्षी परब्रह्म लक्षित होता है, उसी निष्ठा का 'त्वं तदसि' 'अहं तत् ब्रह्मास्मि' इस वाक्य के द्वारा उपदेश किया गया है। उससे विमुक्तता अर्थात् मोह का अपोह- रूप फल प्राप्त होता है। अथवा इसी को एक अन्य प्रकार से भी बताया जा सकता है। तथाहि—दाशरथी राम को विष्णुत्व के उपदेशमात्र से 'विष्णुरहमस्मि'-मैं विष्णु हूँ—इस प्रकार का बोध तत्काल हो सकता है, क्योंकि वह दाशरथी राम महान् महिमा से सम्पन्न है। किन्तु आज के जो लोग हैं; जो कर्ता, भोक्ता आदि प्रत्यक्ष की तरह अनुभव में आनेवाले परन्तु वस्तुतः मिथ्या प्रत्यय से ग्रसित हैं; उनको ब्रह्मोपदेशमात्र से 'अहं ब्रह्मास्मि'—मैं ब्रह्म हूँ, इस प्रकार का निर्विचिकित्स ज्ञान होना कैसे संभव हो सकता है? यह शंका हो सकती है। किन्तु त्वं-पदार्थ का शोधन जिसने कर लिया है, ऐसे पुरुष को ही अर्थात् जो अपने को कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि का साक्षीमात्र समझता है, जिसे अहं आदि शब्द लक्षणा के द्वारा बताते हैं, उसी के लिये यह ब्रह्मात्मोपदेश है, अन्य के लिये नहीं, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ॥ १०१ ॥ श्रुतमात्रेण चेन्न स्यात्कार्यं तत्र भवेद् ध्रुवम् । व्यवहारात्पुरापीष्टः सद्भावः स्वयमात्मनः ॥१०२॥ श्रुतमिति—वाक्य के सुनने मात्र से यदि ज्ञान की उत्पत्ति न हो तो ज्ञानोत्पत्त्यर्थ उसे कार्य की आवश्यकता पड़ सकती है, किन्तु प्रत्यगात्मा की सत्ता तो वाक्योपदेशात्मक व्यवहार के पूर्व भी निश्चित रूप से है, यह सभी जानते हैं ॥ १०२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पद-पदार्थ का ज्ञान जिसे हो गया है, उसे वाक्य से ही 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान हो जाता है, किन्तु उस ज्ञान से यदि समूल संसार की निवृत्ति न मानी जाय तो वेदप्रामाण्य की सिद्धि के लिये उसे कार्यपरक ही मान लेना चाहिए। किन्तु यह कथन विद्वानों के अनुभव के विरुद्ध होने से उचित नहीं है, अथवा इस तरह से भी कह सकते हैं कि पदार्थतत्त्व का ज्ञान प्राप्त किये हुए पुरुष को वाक्य से ही समूल संसारनिवृत्तिरूप फलात्मक ज्ञान हो ही जाता है, तब उस स्थिति में प्रामाण्यसिद्ध्यर्थ श्रुति को कार्यपरक मानने का आग्रह करना व्यर्थ है। उक्त न्याय से