भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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प्राक्कथन संसार में प्राणिमात्र को सुख और दुःख की अनुभूति हुआ करती है। शीतोष्णादि द्वंद्व व्यक्ति की सहनशक्ति अथवा केवल भावना के अनुरूप अनुकूल या प्रतिकूल संवेदन का रूप धारण करते हैं। अनुकूल संवेदन को सुख कहते हैं और प्रतिकूल संवेदन ही दुःख कहलाता है। लोक और वेद—दोनों में संसारियों के सुख-दुःख का यही स्वरूप प्रसिद्ध है। प्रत्येक विषय अन्तःकरण में अनुकूल या प्रतिकूल संवेदन प्रसारित करता है। इन संवेदनों का केवल प्रकाशक और साक्षी होता हुआ भी अविद्यावशात् आत्मा स्वयं को सुखी या दुःखी मान लेता है। मन्त्र, औषधि अथवा सुषुप्ति के संबंध से प्रसुप्त हुआ पुरुष विषय-संस्पर्श का एवं उनसे होनेवाले सुख-दुःखादि का अनुभव नहीं करता क्योंकि सुखदुःखादि वृत्तियों को उत्पन्न करनेवाली मनोवृत्ति और उन्हें आत्मसात् कर स्वयं को सुखी या दुःखी बनानेवाली अहंवृत्ति उस अवस्था में निष्किय हो जाती है। परन्तु अविद्यावृत्ति से युक्त हुए प्राज्ञ का उस समय भी अभाव नहीं रहता। अतः सुषुप्ति में भी अहंवृत्तिनिरपेक्ष शान्तवृत्तिरूप आनन्दानुभूति सबको मान्य ही है। आनन्द ही आत्मा का स्वरूप है। समस्त चेष्टाओं की निवृत्ति ही उसके प्रकाशित होने का स्थान है। सुखरूप अनुकूल संवेदन में प्राप्त इस आनन्द के आभासमात्र के सम्पादन की प्रवृत्ति सभी पुरुषों में दिखायी देती है। परन्तु यह सुख की अनुभूति विषयसापेक्ष ही होती है। किसी भी सांसारिक वस्तु का संयोग आत्मा के लिये वस्तुतः सुखप्रद हो नहीं सकता क्योंकि आत्मा का स्वरूपभूत आनन्द इतरनिरपेक्ष होता है। अतः यह आनन्द ही जिज्ञास्य है। ईश्वर अथवा ब्रह्म को ही सुखस्वरूप जानकर और स्वयं को उससे पृथक् समझकर उसके संयोग हेतु किया गया प्रयास ही आत्मशुद्धि में हेतु बनता है। आत्मा अपरिच्छिन्न, नित्य और अद्वय है। श्रुतियों ने भी इसी तथ्य का समर्थन किया है। ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व को जानना ही अध्यात्मज्ञान है। इस अद्वितीय आत्मा में कार्य-कारण, द्रष्टा-दृश्य, अधिष्ठान-अध्यस्त, व्याप्य- व्यापक आदि भेद कल्पित ही हैं। असत्, अचित् और असुख का बाध करने के अभिप्राय से ही इस आत्मतत्त्व की 'सच्चिदानन्द' संज्ञा प्रसिद्ध है। आत्मा में जन्म-मरण, काम-क्रोध, संयोग-वियोग आदि का सर्वथैव अभाव है। इस प्रकार सुदृढ़ बोध होने पर आत्मज्ञ पुरुष को किसी से किसी प्रकार का भय और कामक्रोधादि से क्षति नहीं हुआ करती। आत्मतत्त्वज्ञान की इस प्रक्रिया को विषद रूप से स्पष्ट कर अविद्याग्रस्त मनुष्यों का मार्गदर्शन करने हेतु भगवत्पूज्यपाद श्रीमच्छङ्कराचार्य ने इस उपदेशसाहस्त्री की रचना कर मानवमात्र को अनुगृहीत किया है। जब तक मनुष्य अपने को ही विस्मृत किये रहता है, तब तक वह इस जन्म-मरणरूप संघर्षात्मक संसार में फँसा रहता है। परमकारुणिक शंकरावतार आचार्यचरणों ने मानव की इस दुर्दशा को देखकर उनके उद्धारार्थ मानो यह संजीवनी औषधि प्रदान की है, जिससे भाग्यशाली लोगों ने लाभ उठाया और भवरोग से मुक्त भी हुए हैं। आज समय बहुत परिवर्तित हो रहा है। लोग शास्त्रों से तो दूर होते ही जा रहे हैं, यहाँ तक कि संस्कृत भाषा से भी परिचित नहीं रहे हैं। तथापि अपने उद्धार की इच्छा उन्हें भी रहती है और उनको भी तो शास्त्रसम्मत विद्या से वंचित नहीं रखना है। इस दृष्टि से आचार्यचरण के इस अद्भुत ग्रन्थ का हिन्दी रूपान्तर विस्तृत व्याख्या के साथ प्रकाशित करने का 'महेश अनुसंधान संस्थान' का प्रयास स्तुत्य है। प्राचीन विद्या के प्रचार-प्रसार एवं इस