भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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२५० - उपदेशसाहस्री - इस रीति से 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थ का अभेद होने के कारण वे दोनों पद 'त्वम्' पदार्थ के दुःखित्व और 'तत्' पदार्थ के अनात्मत्व तथा परोक्षत्व का बाध करते हैं ॥ १९७ ॥ एवं च नेति नेत्यर्थं गमयेतां परस्परम् ॥१९८॥ एवमिति—इस प्रकार वाक्यार्थ करने पर अद्वितीयत्वपरक श्रुति से अविरोध सम्पन्न हो जाता है। अर्थात् वे परस्पर 'नेति-नेति' वाक्य के अर्थ का बोध कराते हैं ॥ १९८ ॥ एवं तत्त्वमसीत्यस्य गम्यमाने फले कथम् । अप्रमाणत्वमस्यो*क्त्वा क्रियापेक्षत्वमुच्यते ॥१९९॥ एवं तत्त्वमसीति—पूर्वपक्षी के मत में अकारण (प्रमाणरहित) ही श्रुतहानि और अश्रुतकल्पना करनी पड़ती है। इस तरह 'तत्त्वमसि' वाक्य के फल का ज्ञान हो जाने पर उसका अप्रामाण्य अथवा क्रियापेक्षत्व कैसे कहा जा सकता है ? उसके प्रामाण्य को पूर्व बता चुके हैं ॥ १९९ ॥ तस्मादाद्यन्तमध्येषु कुर्वित्येतद्विरोध्यतः । न कल्पाऽमोऽश्रुतत्वाच्च श्रुतत्यागोऽप्यनर्थकः ॥२००॥ तस्मादिति—आरंभ में 'तत्त्वमसि' इस प्रथमोपदेश में, मध्य में अर्थात् पदार्थ परिशोधन के अन्वय-व्यतिरेक- ग्रहण काल में और अन्त में अर्थात् निर्विचिकित्स ब्रह्मानुभाव के काल में 'कुरु'=करो—इस प्रकार की विधि का विरोध होने से और उसके श्रुतिमूलक न होने के कारण इसके क्रियापेक्षत्व की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी अवस्था में ब्रह्मात्मैक्य रूप श्रुत अर्थ का त्याग करना भी व्यर्थ ही है ॥ २०० ॥ यथानुभूयते तृप्तिर्भुजेर्वाक्यान्न गम्यते । वाक्यस्य विधित्तिस्तद्वद्गोशकृत्पायसीक्रिया ॥२०१॥ यथेति—उक्त अर्थ को न समझ कर पुनः आक्षेप कर रहा है—जिस प्रकार भोजन करने से ही तृप्तिरूप फल का अनुभव होता है, केवल वाक्यार्थ के ज्ञान मात्र से नहीं, तथा जैसे गोशकृत् (गोमय) से पायस (खीर) नहीं बनती, क्योंकि वह पायस का साधन नहीं है। उसी प्रकार वाक्यार्थ के अवधारण मात्र से ब्रह्मात्मैक्य साक्षात्कार नहीं हो सकता। क्योंकि वह भी उसका साधन नहीं है ॥ २०१ ॥ सत्यमेवमनात्मार्थवाक्यात्पारोक्ष्यबोधनम् । प्रत्यगात्मनि न त्वेवं संख्याप्राप्तिवदध्रुवम् ॥२०२॥ सत्यमेवमिति—इस प्रकार सिद्धान्ती कहता है कि अनात्म वस्तु के प्रतिपादक वाक्य से परोक्ष ज्ञान ही होता है, यह कहना तो ठीक है, किन्तु 'दशमस्त्वमसि' वाक्य से दशम संख्या की प्राप्ति के समान प्रत्यगात्मा के विषय में वैसा अनिश्चित ज्ञान नहीं होता, अपितु निश्चित ही होता है। एवंच वाक्य, निश्चित रूप से अपरोक्ष ज्ञान का साधन है ॥२०२॥ †स्वसंवेद्यत्वपर्यायः स्वप्रमाणक इष्यताम् । निवृत्ता‡वहम्ः सिद्धः स्वात्मनोऽनुभवश्च नः ॥२०३॥ स्वयमिति—'आत्मा' को स्वयंप्रकाश और स्वतःप्रमाण समझो, जिसका अहंकार नष्ट हो गया है, उसे आत्मा का अनुभव होना सिद्ध ही है—यह हमारा सिद्धान्त है ॥ २०३ ॥ हृदयस्पशिनी 'स्वतः अपरोक्ष प्रत्यगात्मा ही ब्रह्म है',—इस उपदेश से अपरोक्ष ज्ञान होता है। आत्मा को स्वयंप्रकाश और स्वतःप्रमाण समझो। क्योंकि 'स्वयं ज्योतिष्ट्वादि' श्रुति १ इसमें प्रमाण है। तथाच वाक्य से ब्रह्मभेदक अहंकार १. (बृ. उ. ४।३।९, १४)

  • क्त्वा—पाठान्तरम् । † स्वयं वे०—पाठान्तरम् । ‡ विदमः—पाठान्तरम् ।