भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २५५ कथमिति—मेरे इस संसाररूप दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति किस प्रकार होगी ? यही प्रश्न किया गया है, अतः उसके अनुरूप ही उत्तर देना चाहिये । अतः दुःखनिवृत्ति के उपाय को बताना ही उचित है। एवं च दुःखनिवृत्ति का उपाय एकमात्र 'ज्ञान' ही है, 'कर्म' नहीं—यह श्रुति ने बताया है ॥ २१९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य का जैसा प्रश्न हो, तदनुकूल ही उत्तर (प्रतिवचन) होना चाहिये—मेरा यह संसाररूप दुःख, सर्वथा निवृत्त (दूर) कैसे होगा ? इस प्रश्न के अनुरूप जो दुःख की निवृत्ति करने वाला हो, उसी का वर्णन करना उचित है । इससे भी स्पष्ट होता है कि दुःखनिवृत्ति का साधनभूत ज्ञान ही श्रुति का प्रतिपाद्य है, कर्म नहीं ॥२१९॥ श्रुतेः स्वात्मनि नाशङ्का प्रामाण्ये सति विद्यते । तस्मादात्मविमुक्तत्वं* प्रत्याययति तद्वचः । वक्तव्यं तत्तथार्थं स्याद्विरोधेऽसति केनचित् ॥२२०॥ श्रुतेरिति—भगवती श्रुति तो 'स्वतःप्रमाण' है। अतः अपने प्रतिपाद्य प्रमेय के विषय में उसे किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। अतः वह शब्द के द्वारा आत्मा की मुक्तता का बोध करा देती है। भगवती श्रुति सबकी परम आप्त है, इसलिये किसी प्रमाण का विरोध न रहने पर यथार्थ अर्थ का प्रतिपादन करना उसका कर्तव्य हो जाता है ॥ २२० ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रसंख्यान के द्वारा प्रश्न के अनुरूप कहा, यह तो ठीक है, क्योंकि तद्व्यतिरेक से (तद्विपरीत) यदि कहेंगे तो श्रुति में दुःखापनोदन का सामर्थ्य नहीं है, यह शंका होती है। उसके उत्तर में कहते हैं कि प्रमेयावबोधन करना ही प्रमाण का कार्य है; उसके अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं। श्रुति का प्रामाण्य स्वतःसिद्ध है, अतः उसे अपने प्रमेय के विषय में कोई सन्देह नहीं है। अतः स्वप्रमेयावभास सामर्थ्याभाव की आशंका नहीं कर सकते । अतः श्रुतिवाक्य से आत्मा की मुक्तता का परिचय प्राप्त होता है। और किसी प्रमाण के साथ विरोध न रहने पर उसे अपना समुचित अर्थ ही बताना चाहिये ॥ २२० ॥ इतोऽन्योऽनुभवः कश्चिदात्मनो नोपपद्यते । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातारमिति श्रुतेः ॥२२१॥ इत इति—उक्त अर्थ का अनुभव करानेवाला 'वाक्य' ही है, यदि उसका परित्याग करें तो अन्य कोई प्रकार नहीं है, जो अनुभव करावे और प्रकारान्तर की कल्पना भी श्रुति विरोध के कारण नहीं की जा सकती ॥ २२१ ॥ हृदयस्पर्शिनी “ज्ञानियों की दृष्टि में आत्मा अविज्ञात है¹” तथा “विज्ञाता को किस प्रमाण के द्वारा जाने²”—इन श्रुतियों के अनुसार इससे भिन्न आत्मा का कोई और अनुभव होना संभव नहीं है ॥ २२१ ॥ त्वंपदार्थविवेकाय संन्यासः सर्वकर्मणाम् । साधनत्वं व्रजत्येवं शान्तो दान्तानुशासनात् ॥२२२॥ त्वमिति—'त्वम्' पदार्थ का विवेक करने के लिये श्रुति ने समस्त कर्मों के त्याग को ही 'साधन' बताया है ॥ २२२ ॥ १. (के. उ. ११) २. (बृ. उ. २।४।१४)

  • त्वप्रत्ययं याति—पाठान्तरम् ।