भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५७ हृदयस्पशिंनी वाक्यार्थज्ञान होने के पूर्व ही विधियों के लिए अवकाश रहता है, वाक्यार्थज्ञान हो जाने के पश्चात् नहीं । तात्पर्य यह है कि वाक्यार्थज्ञान हो जाने के अनन्तर कोई कर्मविधि नहीं रहती। क्योंकि 'मैं ब्रह्म हूँ' और 'मैं कर्ता हूँ' ये दो परस्परविरुद्ध बुद्धियाँ (ज्ञान) कभी एकसाथ नहीं रह सकती ॥ २२५ ॥ ब्रह्मास्मीति च विद्येयं नैव कर्तेति बाध्यते । सकामो बद्ध इत्येवं प्रमाणाभासजातया ॥२२६॥ ब्रह्मास्मीति—'मैं ब्रह्म हूँ'—इस ज्ञान (बुद्धि) को ही 'विद्या' कहते हैं। इसका बाध (निवृत्ति) प्रमाणा- भास से पैदा हुई बुद्धि के द्वारा नहीं हो सकता । अर्थात् 'मैं कर्ता हूँ', मैं सकाम हूँ', 'मैं बद्ध हूँ',—यह ज्ञान (बुद्धि) प्रमाणा- भास से होती है, यह सब अविद्या है। अतः 'अविद्या' से 'विद्या' का बाध नहीं हो सकता ॥ २२६ ॥ हृदयस्पशिनी फिर भी यह शंका हो सकती है कि ऐक्यज्ञान से भेदज्ञान का ही क्यों बाध होता है ? विपरीत बाध्य - बाधकभाव को ही क्यों न कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी बुद्धि को ही ज्ञान कहते हैं और 'मैं कर्ता हूँ', 'मैं सकाम हूँ', 'मैं बद्ध हूँ' यह प्रमाणाभासजनित ज्ञान है। अतः विपरीत बाध्य-बाधकभाव नहीं हो सकता, क्योंकि 'बोधवृत्ति' तो प्रमाणजनित है, और 'कर्तृत्वादि बुद्धि' भ्रमजनित है। अतः ज्ञान से ही भ्रम का बाध होता है, भ्रम से ज्ञान का बाध नहीं होता ॥ २२६ ॥ शास्त्रादब्रह्मास्मि नान्योऽहमिति बुद्धिर्भवेद्दृढा । यदा युक्ता तदैवंधीर्यथा देहात्मधीरिव ॥२२७॥ शास्त्रादिति—शास्त्रप्रमाण से मुमुक्षु को जब 'मैं ब्रह्म हूँ, अन्य कोई नहीं हूँ'—यह निश्चित (सुदृढ़) ज्ञान (बुद्धि) हो जाता है, तब उसे 'देहात्मबुद्धि' नहीं होती, उसी तरह 'मैं कर्ता हूँ'—यह बुद्धि भी उसे नहीं होती ॥ २२७ ॥ हृदयस्पशिनी स्वभावप्रवृत्त बुद्धि का प्रमाणजनित बुद्धि से ही बाध होता है, इसे दृष्टान्त देकर बताते हैं। जैसे— शास्त्र के द्वारा 'मैं ब्रह्म हूँ, अन्य कोई नहीं हूँ'—यह बुद्धि जब दृढ़ हो जाती है, तब देहात्मबुद्धि अर्थात् 'मैं मनुष्य हूँ, कर्ता हूँ'—इस प्रकार की बुद्धि नहीं हुआ करती ॥ २२७ ॥ सभयाद्भयं प्राप्तस्तदर्थं यतते च यः। स पुनः सभयं गन्तुं स्वतन्त्रश्चेन्न *होच्छति ॥२२८॥ सभयादिति—जो व्यक्ति भय के स्थान से निकल कर भयरहित स्थान पर पहुँच गया हो, और उसी निर्भ- यता के लिये जो सतत प्रयत्न करता रहता हो वह यदि आने-जाने में स्वतन्त्र है, तो भी वह पुनः भय के स्थान में नहीं जा सकता ॥ २२८ ॥ हृदयस्पशिंनी जो आदमी भय से युक्त स्थान से निकल कर भयरहित स्थान में पहुँच गया है, और उसी के लिए वह प्रयत्न भी करता रहा है, वह आदमी जाने-आने की क्रिया में स्वतन्त्र रहता हुआ भी पुनः भय से युक्त स्थान में नहीं जाता ॥ २२८ ॥ यथेष्टाचरणप्राप्तिः संन्यासादिविधौ कुतः। पदार्थाज्ञानबुद्धस्य वाक्यार्थानुभवाथिनः१ ॥२२९॥ १. नै. सि. ४।६१-६२, तथा भ. गी. ४।१९, १४।२२ से तुलना की जा सकती है ।

  • गच्छति—पाठान्तरम् । ३३