उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वमसिप्रकरणम् २५९ वेदान्तवाक्यपुष्पेभ्यो ज्ञानामृतमधूत्तमम् । उज्जहारालिवद्यो नस्तस्मै सद्गुरवे नमः ॥२३३॥ वेदान्तेति—जिन्होंने हमारे लिये वेदान्त के वाक्य रूपी पुष्पों से मधुकर (भ्रमर) के समान ज्ञानामृतरूपी मधु निकाल कर दिया, उन सद्गुरु के लिये हमारा प्रणाम है ॥ २३३ ॥ हृदयस्पर्शिनी ज्ञानी पुरुष के लिए यद्यपि कोई कार्य शेष नहीं है, तथापि गुरु और शास्त्र के प्रति आदरबुद्धि रखनी ही होगी, इसलिए शिष्य-शिक्षार्थ यह बता रहे हैं कि जिन्होंने भ्रमर के समान वेदान्तवाक्यरूप पुष्पों से हमारे लिए ज्ञानामृतरूप उत्तम मधु निकालकर पान कराया है, उन सद्गुरुदेव के लिए प्रणाम है ॥ २३३ ॥ ॥ इत्यष्टादशं तत्त्वमसिप्रकरणं समाप्तम् ॥