उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८४ उपदेशसाहस्री लब्धपरमात्मलक्षणस्मृतये ब्रूयात्—योऽसावाकाशनामा नामरूपाभ्यामर्थान्तरभूतोऽशरीरः, अस्थूलादिलक्षणः, अपहतपाप्मत्वादिलक्षणश्च, सर्वैः संसारधर्मैरनागन्धितः, यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म, य आत्मा सर्वान्तरः, अदृष्टो द्रष्टा, अश्रुतः श्रोता, अमतो मन्ता, अविज्ञातो विज्ञाता, नित्यविज्ञानस्वरूपः, अनन्तरः, अबाह्यः, विज्ञानघन एव, परिपूर्ण, आकाशवत्, अनन्तशक्तिः, आत्मा सर्वस्य, अशनायादि- वर्जितः, आविर्भावतिरोभाववर्जितश्च स्वात्मविलक्षणयोर्नामरूपयोर्जगद्बीजभूतयोः स्वात्मस्थयोस्तत्त्वा- न्यत्वाभ्यामनिर्वचनीययोः स्वसंवेद्ययोः सद्भावमात्रेणाचिन्त्यशक्तित्वाद्व्याकर्ताऽव्याकृतयोः ॥१८॥ हृदयस्पर्शिनी लब्धेति—इसप्रकार श्रुति-स्मृतिप्रतिपादित आत्मस्वरूप का स्मरण दिलाकर शरीर की भिन्न जाति, अन्वय (कुल), संस्कार का ज्ञापन करने के लिये उसकी उत्पत्ति के प्रकार को बतावे । जिसे परमात्मा के लक्षणों का स्मरण हो आया है, उस शिष्य से यह कहे—यह जो आकाशसंज्ञक सब का आत्मा है१, वह नाम और रूप से भिन्न पदार्थ है२, तथा वह शरीररहित, अस्थूलादि लक्षणोंवाला और अपहतपाप्मादि लक्षणों वाला एवं समस्त सांसारिक धर्मों से असंश्लिष्ट है । जैसा कि श्रुति बता रही है—"जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म ही है", "जो सर्वान्तर आत्मा है," तथा "जो स्वयं न दीखने वाला किन्तु सबका साक्षी, स्वयं सुनाई न देनेवाला किन्तु सब कुछ सुनने वाला स्वयं मन का अविषय किन्तु सब कुछ मनन करनेवाला, स्वयं अविज्ञात किन्तु सबका ज्ञाता है, तथा जो नित्य विज्ञानस्वरूप है" वह अन्तरशून्य, बाह्यशून्य, विज्ञानघन आकाश के समान परिपूर्ण३, अनन्तशक्ति४, क्षुधादि से रहित, आविर्भाव-तिरोभाव- शून्य, और अचिन्त्य होने के कारण अपने में स्थित, अपने से विलक्षण, जगत् के बीजभूत, सद्-असत् से अनिर्वचनीय, स्वसंवेद्य, अव्याकृत नाम और रूपों को अपने सद्भावमात्र से अभिव्यक्त करनेवाला है। क्योंकि नामरूप में भी सत्ता तो आत्मा की ही है ॥ १८ ॥ ते नामरूपे अव्याकृते सती व्याक्रियमाणे तस्मादेतस्मादात्मन आकाशनामाकृती संवृत्ते । तच्चाकाशाख्यं भूतं, अनेन प्रकारेण, परमात्मनः संभूतं, प्रसन्नादिव सलिलान्मलमिव फेनम् । न सलिलं न च सलिलादत्यन्तं भिन्नं फेनं—सलिलव्यतिरेकेणादर्शनात्; सलिलं तु स्वच्छं, अन्यच्च* फेनान्मलरूपात् । एवं परमात्मा नामरूपाभ्यामन्यः फेनस्थानीयाभ्यां, शुद्धः प्रसन्नस्तद्विलक्षणः । ते नामरूपे अव्याकृते सती व्याक्रियमाणे फेनस्थानीये आकाशनामाकृती† संवृत्ते ॥१९॥ हृदयस्पर्शिनी ते नामरूपे इति—वे नाम और रूप अव्याकृत अवस्था में रहते हुए जब व्याकृत (व्यक्त) किये जाने लगे तब अपहतपाप्मत्वादिलक्षण अचिन्त्यशक्तिमान् सर्वज्ञ इस आत्मा से 'आकाश' नाम (वाचक शब्द) और आकाश की वाच्याकार आकृतिवाले हो गये । अर्थात् इस रीति से वे नाम और रूपव्यवहार के योग्य हो गये । तात्पर्य यह है कि १. “आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा ।"—(छां. उ. ८।१४।१) २. आकाशनाम कहने से किसी को भूताकाश की शंका न हो जाय इसलिये "आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात्"—(ब्र. सू. १।३।४२) इस न्याय से उसे भूताकाश से भिन्न बताया गया है । भूताकाश नामरूपान्तःपाति होने से उनका आधारभूत आत्मा, आधेयभूत आकाश से अन्य है । असंगत्वादि के कारण आकाश से इसका साम्य होने से उसे (परमात्मा को) भी आकाश शब्द से कहा गया है, उसे गौणी वृत्ति से समझना चाहिये । ३. 'पूर्ण' कर्मणि निष्ठा प्रत्यय नहीं है, अपितु कर्तरि है । ४. "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ।"—(ऋ. सं. ६।४७।१८, श. प. ब्रा. १४।५।५।१९, तथा बृ. उ. २।५।१९, जै. उ. ब्रा. १।४४।१) * मन्यत् फेना०—पाठान्तरम् । † नामरूपाकृती—पाठान्तरम् ।