भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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२९० उपदेशसाहस्री

कर्मानुष्ठान का भी प्रतिषेध हुआ समझना चाहिये, क्योंकि कर्म और उनके यज्ञोपवीतादि साधन परमात्मा से अभेद- ज्ञान के विरोधी हैं। कर्म और उनके साधन यज्ञोपवीतादि का संसारी पुरुषों के लिये ही विधान किया गया है। पर- मात्मा के साथ अपना अभेद देखने वाले के लिये नहीं किया गया है। संसारी जीव का तो परमात्मा से भेद है और वह भेददृष्टि के कारण ही है, वास्तविक नहीं है। क्रिया, कारक, फल आदि भेद का आश्रय किये बिना कर्म का स्वरूप ही सिद्ध नहीं हो सकता। कर्म का स्वरूप तो भेदज्ञान पर ही निर्भर है। श्रुति ने ही यज्ञोपवीत धारण आदि में कर्म की साधनता बताई है। किन्तु साध्य कर्म के अभाव में उसके साधनों का परिग्रह करना निरर्थक ही है। 'मैं ब्रह्म हूँ', और 'मैं कर्ता हूँ' इन दो विरुद्ध प्रतिपत्तियों का समुच्चय एक पुरुष में होना संभव नहीं है। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि अधिकारी के अभाव में वेदोक्त कर्मकाण्ड निराधार है, अप्रमाण है। वह जाति, कुल आदि का अभिमान रखनेवाले संसारी जीव के लिए बताया गया है। अभेददर्शी के लिए वह नहीं है ॥ ३० ॥

यदि कर्माणि कर्तव्यानि, न विनिवर्तयिषितानि, कर्मसाधनासम्बन्धिनः कर्मनिमित्तजात्या- श्रमाद्यसम्बन्धिनश्च, परमात्मन* आत्मनैवाभेदप्रतिपत्तिं नावक्ष्यत्—“स आत्मा तत्त्वमसि” इत्येवमादि- भिर्निश्चितरूपैर्वाक्यैः । भेदप्रतिपत्तिनिन्दां च नाभ्यधास्यत् ॥ ३१॥

हृदयस्पशिनी यदीति—श्रुति ने ब्रह्मात्मैक्यप्रतिपत्ति के द्वारा कर्म और उनके साधनों का जो प्रतिषेध किया, उसी को अब व्यतिरेक से बता रहे हैं। कर्तव्य कर्मों की निवृत्ति यदि श्रुति को अभीष्ट नहीं होती तो वह कर्मसाधनों से असंबन्धित तथा कर्मनिमित्तक जाति एवं आश्रमादि से असंबंधित परमात्मा का “वह आत्मा है और वह तू है¹” ऐसे निश्चित रूप वाक्यों के द्वारा आत्मा के साथ अभेद का प्रतिपादन न करती और न “यह ब्राह्मण की नित्य महिमा है²” “वह पुण्य से असंश्लिष्ट है और पाप से भी असंश्लिष्ट है³” “यहाँ चौर, अचौर हो जाता है⁴” आदि वाक्यों द्वारा भेदज्ञान की निन्दा नहीं की होती ॥ ३१ ॥

“एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य”, “अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन”, “अत्र स्तेनोऽस्तेनः”—इत्यादिना कर्मासम्बन्धित्वरूपत्वं कर्मनिमित्तवर्णाद्यसम्बन्धरूपतां च नाभ्यधास्यत्, कर्माणि च कर्मसाधनानि च यज्ञोपवीतादीनि यद्यपरितित्याजयिषितानि; तस्मात्ससाधनं कर्म परित्यक्तव्यं मुमुक्षुणा—परमात्माभेददर्शनविरोधात्—आत्मा च पर एव प्रतिपत्तव्यो यथाश्रुत्युक्तलक्षणः ॥ ३२॥

हृदयस्पर्शिनी एष इति—दूसरा कारण यह भी है कि यदि श्रुति को यज्ञादि कर्म और यज्ञोपवीतादि कर्मसाधनों का त्याग अभीष्ट न होता तो वह आत्मा की कर्मासम्बन्धिरूपता तथा कर्मनिमित्तक वर्णादिसंसर्गशून्यता का वर्णन न करती । अतः मुमुक्षु पुरुष साधनसहित कर्मों का परित्याग करे, क्योंकि उनका परमात्मा के अभेदज्ञान के साथ विरोध है। अतः श्रुति के द्वारा बताये हुए लक्षणों से युक्त आत्मा को परब्रह्म ही समझना चाहिए ॥ ३२ ॥

स यदि ब्रूयात्—भगवन्, दह्यमाने छिद्यमाने वा देहे प्रत्यक्षा वेदना; अशनायादिनिमित्तं च प्रत्यक्षं दुःखं मम । परश्चायमात्मा, “अयमात्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः” †सर्वसंसारधर्मविवर्जितः श्रूयते सर्वश्रुतिषु स्मृतिषु च । कथं तद्विलक्षणोऽनेकसंसारधर्मसंयुक्तः परमात्मा-


१. (छां. उ. ६।८।७ ) २. (बृ. उ. ४।४।२३ ) ३. ( बृ. उ. ४।३।२२ ) ४. ( बृ. उ. ४।३।२२ )

  • आत्म०—पाठान्तरम् । † सर्वगन्ध-रसवर्जितः०—पाठान्तरम् ।