उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिष्यानुशासनप्रकरणम् २९३ गया, मैं जल गया' इस प्रकार अपने आत्मा को देह से अभिन्न माननेवाला व्यक्ति सन्तप्त (दुःखी) होता है। छेदन या दाह से होने वाली वेदना, उसके संस्कार, स्मृति, द्वेष आदि ये सब, देह से अभिन्न आत्मा में ही उपलब्ध होते हैं। देहाभिमानरहित अवस्था में ये सब नहीं हुआ करते । देह, उपलभ्यमान होने से उपलब्धि का कर्म है। वह उपलब्धि का आश्रय नहीं है। इस कारण संघातात्मक शरीर के ही ये वेदनादि हैं, असंहत साक्षी आत्मा के नहीं । आत्मा तो नित्य शुद्ध ही है। वृद्ध लोग भी इस तरह कहते हैं—रूपादि संस्कार और तज्जन्य रागादि सब कुछ बुद्ध्याश्रित ही उपलब्ध होते हैं, अपने साक्षी के आश्रित नहीं होते । अतः ज्ञाता (आत्मा) सर्वदा शुद्ध (राग-द्वेष से रहित), अभय (संसार रहित) है ।। ३५ ।। किमाश्रयाः पुनारूपसंस्कारादय इति ? उच्यते—यत्र कामादयः । क्व पुनस्ते कामादयः ? “कामः संकल्पो विचिकित्सा” इत्यादिश्रुतेर्बुद्धावेव । तत्रैव रूपादिंसंस्कारादयोऽपि, “कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदये” इति श्रुतेः । “कामा येऽस्य हृदि श्रिताः”, “तीर्णो हि तदा सर्वान्शोकान् हृदयस्य”, “असङ्गो ह्ययम्”, “तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दाः” इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः; “अविकार्योऽयमुच्यते”, “अनादित्वान्निर्गुणत्वात्” इत्यादिभ्यः—इच्छाद्वेषादि च क्षेत्रस्यैव विषयस्य धर्मः, नात्मन इति— स्मृतिभ्यश्च कर्मस्थैवाशुद्धिः नात्मस्थेति ।।३६।। हृदयस्पशिनी किमाश्रया इति—यद्यपि वेदनादिकों का अनात्मधर्मत्व, युक्ति से तथा वृद्धसम्मति से उपपादन कर चुके हैं तथापि पुनः प्रश्नपूर्वक श्रुति के द्वारा प्रतिपादन करते हुए उसके आश्रयविशेष का निर्धारण करते हैं। रूप आदि के संस्कार ( सूक्ष्मावस्था ) आदि का आश्रय कौन है ? इस प्रकार प्रश्न करने पर उत्तर देते हैं कि 'जहाँ कामादि रहते हैं, वहीं उनके संस्कारादि भी रहते हैं। और वे कामादि कहाँ रहते हैं ? तो बताया कि "काम, संकल्प, विचिकित्सा' ( संशय )" आदि श्रुति के अनुसार बुद्धि में ही रहते हैं, और वहीं पर रूपादि संस्कार भी रहते हैं। रूप किसमें प्रतिष्ठित है ? तो बताया 'हृदय'² में । इस श्रुति के अनुसार रूपादि के संस्कार भी वहीं रहते हैं। “इसके हृदय में जो कामनाएँ आश्रित हैं",३ "जबकि यह हृदय के समस्त शोकों से पार हो जाता है",४ यह ( आत्मा ) असंग है,' " इसका यह आत्मा कामादि दोषों से रहित है"६ इत्यादि सैकड़ों श्रुतियों तथा "वह अविकार्य कहा जाता है", "अनादि और निर्गुण होने के कारण"८ इत्यादि स्मृतियों से भी यही सिद्ध होता है। और इच्छा और द्वेषादि तो विषयरूप क्षेत्र के ही धर्म है, आत्मा के नहीं। अतः स्मृतियों के अनुसार यह अशुद्धि, कर्म ( विषयभूत अनात्मा ) में ही है, आत्मा में नहीं है ।। ३६ ।। अतो रूपादिंसंस्काराद्यशुद्धिसम्बन्धाभावान्न परस्मादात्मनो विलक्षणस्त्वमिति प्रत्यक्षादि- विरोधाभावाद्युक्तं पर एवात्माऽहमिति प्रतिपत्तुम्, “तदात्मानमेवावेत् अहं ब्रह्मास्मीति”, एकधैवानु- द्रष्टव्यम्”, “अहमेवाधस्तात्”, “आत्मैवाधस्तात्”, “सर्वमात्मानं पश्येत्”, “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैव”, १. ( बृ. उ. १।५।३, मै. उ. ६।३० ) २. ( बृ. उ. ३।९।२० ) ३. ( बृ. उ. ४।४।७, कठ उ. ६।१४ ) ४. ( बृ. उ. ४।३।२२ ) ५. ( बृ. उ. ४।३।१५ ) ६. ( बृ. उ. ४।३।२१ ) ७. ( भ. गी. २।२५ ) ८. ( भ. गी. १३।३१ ) ९. “इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत् क्षेत्रं समासेन सविकार मुदाहृतम् ॥”—( भ. गी. १३।६ )