भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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६ उपदेशसाहस्री शंका—विद्या के बिना अज्ञान का क्षय (निवृत्ति) यदि नहीं होता है, तो अज्ञानक्षय के लिए ही विद्या को समझा जाय; प्रपञ्च की निवृत्ति उससे नहीं होगी, क्योंकि अज्ञान के कार्यभूत संसार (प्रपञ्च) की पारमार्थिकता (सत्यता) होने से विद्या के द्वारा उसका नाश होना संभव नहीं है । अतः उसके नाश (निवृत्ति) के लिये किसी अन्य हेतु (कारण) को सोचा जाय । समा—अज्ञान की निवृत्ति (नाश) हुए बिना रागादि दोषों का क्षय (नाश) नहीं हो पायगा, क्योंकि 'अविवेक रहने पर रागादिदोष होते हैं, और अविवेक के न रहने पर रागादिदोष नहीं होते' इस अन्वय—व्यतिरेक के बलपर यह सिद्ध हो जाता है कि रागादिदोष अविवेकपूर्वक हैं, अर्थात् अविवेक ही रागादिदोषों के होने में कारण है। ये रागादि अज्ञानमय हैं, पारमार्थिक (वास्तविक) नहीं हैं। इस कारण इनकी निवृत्ति अज्ञान की निवृत्ति से ही हो सकती है। अतः उनकी निवृत्ति के लिये किसी अन्य हेतु (कारण) के सोचने की आवश्यकता नहीं है ॥ ६ ॥ रागद्वेषक्षयाभावे कर्म दोषोद्भवं ध्रुवम् । तस्मिन्निःश्रेयसार्थाय विद्यैवात्र विधीयते ॥ ७ ॥ रागेति—राग-द्वेष का क्षय (अभाव) न होने पर उन दोषों के कारण पुनः कर्म की उत्पत्ति होना भी सुनिश्चित है। अतः श्रेय प्राप्ति (कल्याण की प्राप्ति) के लिये यहाँ ज्ञान का ही विधान किया जा रहा है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी कुछ लोगों के मन में यह शंका होती है कि रागादि दोषों की निवृत्ति यदि न हो तो क्या हानि है ? इस शंका के समाधानार्थ श्री आचार्यचरण कहते हैं कि रागादि दोषों की निवृत्ति न होनेपर उन राग, द्वेष, मोहादि दोषों से कर्म की उत्पत्ति का होना सुनिश्चित है, क्योंकि कर्म की उत्पत्ति में रागादि दोष ही कारण (हेतु) होते हैं। तब कर्म के होने पर कर्माधीन इस संसार का होना भी निश्चित ही है, उसे कोई रोक नहीं सकता । एवञ्च कर्म से मोक्ष (मुक्ति) नहीं हो सकता । अतः मोक्षप्राप्त्यर्थ वेदान्त-सिद्धान्त को प्रकाशित किया जा रहा है कि 'निःश्रेयस (मोक्ष) के लिये एक मात्र विद्या (ज्ञान) ही समर्थ है' १ ॥ ७ ॥ ननु कर्म तथा नित्यं कर्तव्यं जीवने सति । विद्यायाः सहकारित्वं मोक्षं प्रति हि तद् व्रजेत् ॥ ८ ॥ 'ज्ञान ही अज्ञान का निवर्तक है, कर्म नहीं'—यह सुनकर ज्ञान-कर्म समुच्चयवादी कह रहा है— नन्विति—ज्ञान के समान कर्म भी यावज्जीवन (सदा-सर्वदा) करते रहना चाहिये, क्योंकि (यद्यपि स्वतन्त्र रूप से कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं है, तथापि) वह (कर्म) मोक्षसाधन करने में ज्ञान सहायक (सहकारी) तो बन ही सकता है ॥ ८ ॥ १. नैष्कर्म्यसिद्धि के प्रारम्भ में कहा गया है कि दुःख का एकमात्र कारण देह ही है, और देहप्राप्ति का कारण पूर्वोपचित (पूर्वसञ्चित) धर्माऽधर्म हैं, और धर्माऽधर्म के कारण विहित-प्रतिषिद्ध कर्म हैं, कर्म के कारण राग-द्वेष हैं, राग-द्वेष में कारण शोभन, अशोभन अध्यास है, अध्यास में कारण अविचारित सिद्ध द्वैत वस्तु है, और द्वैत में शुक्ति-रजतादि के तुल्य स्वतः सिद्ध अद्वितीय आत्मा का अज्ञान कारण है । निष्कर्ष यह है कि सम्पूर्ण अनर्थप्राप्ति में हेतु (कारण) आत्मा का अज्ञान ही है । पारमार्थिक सुख आगमाऽपायी नहीं हैं। वह तो परतन्त्र स्वात्मस्वरूप है, उसका अज्ञान ही उसका आवरण है। उस सुख का यदि अत्यन्त उच्छेद (नाश) हो जाय तो अशेष (सम्पूर्ण) पुरुषार्थ की ही समाप्ति हो जायगी । सम्यग्ज्ञान (यथार्थ तत्त्वज्ञान के स्वरूप का लाभ) अज्ञान की निवृत्ति से ही हो सकता है। अतः अज्ञान की निवृत्ति करना अत्यन्त आवश्यक है। अशेष अनर्थ की प्राप्ति में हेतुभूत अज्ञान को निवृत्ति, प्रत्यक्षादि लौकिक प्रमाणों से हो नहीं सकती, उसकी निवृत्ति तो वेदान्तागमप्रतिपादित वाक्यों से होने वाले सम्यग् ज्ञान से ही हो सकती है ।