उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 323, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिष्यानुशासनप्रकरणम् २१७ अभिप्राय को आचार्य बता रहे हैं। साधनों (उपायों) से ही इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार की इच्छा रखने- वाले किन्तु उनके उपाय को न जानने वाले पुरुष का जो अज्ञान है, उसे शनैः शनैः दूर करने के लिये ही 'शास्त्र' है। वह साध्य-साधनादि भेद का विधान नहीं करता, क्योंकि वह तो अनिष्टरूप संसार ही है। अतः संसार के उत्पत्ति- प्रलयादि के द्वारा एकत्व की उपपत्ति प्रदर्शित कर वह उस भेददृष्टिरूप अविद्या (संसार) का ही उच्छेद करता है ॥ ४२ ॥
अविद्यायामुन्मूलितायां श्रुतिस्मृतियुक्तिभ्यः अनन्तरोऽबाह्यः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः सैन्धव- घनवत्प्रज्ञानघन एवैकरस आत्मा आकाशवत्परिपूर्ण *इत्येवैका प्रज्ञा प्रतिष्ठिता परमार्थदर्शिनो भवति, न साध्यसाधनोत्पत्तिप्रलयादिभेदेनाशुद्धिगन्धोऽप्युपपद्यते ॥४३॥
हृदयस्पर्शिनी अविद्यायामिति—इस रीति से श्रुति, स्मृति और युक्ति से अविद्या का समूल उन्मूलन (उच्छेद) हो जाने पर उस परमार्थदर्शी मुमुक्षु की एकनिष्ठ बुद्धि 'अन्तर-बाह्य शून्य है', 'बाहर-भीतर विद्यमान और अजन्मा है', 'सैन्धवघन के तुल्य है', 'आत्मा एक और प्रज्ञानघन ही है', 'आत्मा आकाश के समान परिपूर्ण है' इस, लक्ष्यपर ही स्थिर हो जाती है। फिर उसमें साध्य-साधन और उत्पत्ति-प्रलयादि भेद से अशुद्धि का गन्धमात्र भी होना असंभव है ॥ ४३ ॥
तच्चैतत्परमार्थदर्शनं प्रतिपत्तुमिच्छता वर्णाश्रमाद्यभिमानकृतपाङ्क्तरूपपुत्रवित्तलोकैषणादिभ्यो व्युत्थानं कर्तव्यं, सम्यक्प्रत्ययविरोधात्तदभिमानस्य । भेददर्शनप्रतिषेधार्थोपपत्तिश्चोपपद्यते । न ह्येकस्मिन्नात्मन्यसंसारित्वबुद्धौ शास्त्रन्यायोत्पादितायां तद्विपरीता बुद्धिर्भवति । न ह्यग्नौ शीतत्वबुद्धिः, शरीरे वाऽजरामरणबुद्धिः । तस्मादविद्याकार्यत्वात् सर्वकर्मणां तत्साधनानां च यज्ञोपवीतादीनां परमार्थ- दर्शननिष्ठेन त्यागः कर्तव्यः ॥४४॥
हृदयस्पर्शिनी तच्चैतदिति—इस परमार्थ दर्शन की प्राप्ति के अभिलाषी व्यक्ति को वर्णाश्रमादि के अभिमान से होने वाली पाङ्क्त रूप (पाँच प्रकार की) पुत्र, वित्त और लोकव्यवहार संबंधी एषणाओं से ऊपर उठना ही चाहिये। क्योंकि इनका अभिमान, सम्यक् ज्ञान का विरोधी है। इसलिये भेददर्शन का प्रतिषेधरूप जो अर्थ है, उसकी भी उपपत्ति उचित ही है। एक ही आत्मा में शास्त्र और युक्ति के द्वारा असंसारित्वबुद्धि उत्पन्न कर दिये जाने पर, पुनः उसमें उससे विपरीत बुद्धि नहीं हो सकती। जैसे अग्नि में शीतत्वबुद्धि अथवा शरीर में अजरामरबुद्धि कभी नहीं हो सकती। अतः सम्पूर्ण कर्म और उनके यज्ञोपवीतादि साधन अविद्या के कार्य होने से उनका त्याग ही करना उचित है। बृहदारण्यकोपनिषद् में पाङ्क्तोपासना का उल्लेख इस प्रकार किया गया है कि पहले एकमात्र आत्मा ही था। उसने इच्छा की कि मेरे पत्नी हो, फिर उसने पुत्र की कामना की, पश्चात् धन की इच्छा की और फिर कर्मा- नुष्ठान की कामना की। पुरुष जब तक इन विषयों को प्राप्त नहीं करता, तब तक वह यही समझता है कि अभी मुझे कुछ प्राप्त करना है, अभी मैं पूर्ण नहीं हूँ। 'पाङ्क्त' शब्द का अर्थ पाँच का समूह है। अतः यजमान, पत्नी, पुत्र, मानुष वित्त, और दैववित्त इन पाँच से निष्पन्न होनेवाले यज्ञादि को 'पाङ्क्त' कहते हैं। इहलोक पुत्र द्वारा प्राप्त होता है, पितृलोक मानुष वित्त से प्राप्त होता है और देवलोक दैववित्त से जीता जाता है। पाङ्क्त रूप से उपासना करने के लिये श्रुति ने मन को आत्मा
- इत्यत्रैवैका०—पाठान्तरम् । ३८