भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 328

३०२ उपदेशसाहस्री नहीं है, वैसा नियम नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसमें व्यभिचार दिखाई देता है। हे वत्स ! प्रसिद्ध वस्तु का प्रसिद्ध वस्तु में ही अध्यारोप करने का कोई नियम नहीं है। क्योंकि आत्मा में भी अध्यारोप होता देखा जाता है। 'मैं गौर हूँ, मैं कृष्ण (काला) हूँ' इस प्रकार देह (शरीर) के धर्मों का 'अहम्' प्रत्यय के विषयभूत 'आत्मा' में और 'यह मैं हूँ' इस प्रकार 'अहम्' प्रत्यय के विषयभूत आत्मा का देह में अध्यास होता देखा जाता है। देह और आत्मा की पृथक्- पृथक् प्रसिद्धि नहीं है। अतः वहाँ पर उक्त नियम का व्यभिचार है ॥ ५२ ॥ शिष्य आह—प्रसिद्ध एव तर्ह्यात्माऽहंप्रत्ययविषयतया, देहश्चायमिति । तत्रैवं सति, प्रसिद्ध- योरैव देहात्मनोरितरेतराध्यारोपणा* स्थाणुपुरुषयोः शुक्तिकारजतयोरिव । तत्र कं विशेषमाश्रित्य भगवतोक्तं प्रसिद्धयोरितरेतराध्यारोपणेति नियन्तुं न शक्यत इति ? ॥५३॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति—प्रसिद्ध स्थाणु और पुरुष का जैसे परस्पर अध्यास होता है, वैसे ही इन्द्रियविषयत्वेन और अहं-प्रत्ययविषयत्वेन प्रसिद्ध देह और आत्मा का भी परस्पराध्यास होता है। अतएव मनुष्य गौर-श्यामादि देह- धर्मों को आत्मा में और आत्मा के चेतनत्वादि धर्म को देह में समझता है। ऐसी स्थिति में भगवान् गुरुदेव ने किस विशेषता को लेकर यह कहा था कि 'प्रसिद्ध पदार्थों का ही एक-दूसरे में अध्यास होता है'—इस प्रकार का नियम नहीं किया जा सकता ॥ ५३ ॥ गुरुराह—शृणु, सत्यं प्रसिद्धौ देहात्मानौ । न तु स्थाणुपुरुषाविव विविक्तप्रत्ययविषयतया सर्वलोकप्रसिद्धौ । कथं तर्हि ? नित्यमेव निरन्तराविविक्तप्रत्ययविषयतया प्रसिद्धौ । न हि—अयं देहः, अयमात्मा—इति विविक्ताभ्यां प्रत्ययाभ्यां देहात्मानौ गृह्णाति यतः कश्चित् । अत एव हि मोमुह्यते लोक आत्माऽनात्मविषये—एवमात्मा, नैवमात्मेति इमं विशेषमाश्रित्य अवोचं नैवं नियन्तुं शक्यमिति ॥५४॥ हृदयस्पर्शिनी गुरुरिति—इसपर गुरु कहते हैं—देह और आत्मा दोनों प्रसिद्ध हैं, यह तुम्हारा कहना सत्य है। किन्तु वे सर्वलोकप्रसिद्ध रहने पर भी पुरुष के तुल्य अलग-अलग ज्ञान के विषयरूप से प्रसिद्ध नहीं हैं। तो उनकी प्रसिद्धि किस प्रकार से है ? देह और आत्मा तो हमेशा ही व्यवधानशून्य अपृथक् प्रतीति के विषयरूप से जाने जाते हैं, क्योंकि कोई भी व्यक्ति 'यह देह है' और 'यह आत्मा है' इस प्रकार अलग-अलग प्रतीतियों के द्वारा देह और आत्मा का ग्रहण नहीं करता। अतएव आत्मा और अनात्मा के विषय में 'आत्मा इस प्रकार का है, इस प्रकार का नहीं है' यह मोह होता है। इसी विशेषता को दृष्टि में रखकर मैंने कहा था कि ऐसा नियम नहीं किया जा सकता है। अतः मैंने तुम्हारे अभीप्सित नियम का जो व्यभिचार बताया, वह उचित ही है ॥ ५४ ॥ नन्वविद्याध्यारोपितं यत्र यत्, तदसत् तत्र दृष्टम्—यथा रजतं शुक्तिकायाम्, स्थाणौ पुरुषः, रज्जवां सर्पः, आकाशे तलमलिनत्वमित्यादि, तथा देहात्मनोरपि नित्यमेव निरन्तराऽविविक्तप्रत्य†येनेतरेत- राध्यारोपणा कृता स्यात्—तदितरेतरयोर्नित्यमेवासत्त्वं स्यात्—यथा शुक्तिकादिष्वविद्याध्यारोपितानां रजतादीनां नित्यमेवात्यन्तासत्त्वम्, तद्विपरीतानां च विपरीतेषु, तद्वद्देहात्मनोरविद्ययैवेतरेतराध्यारोपणा कृता स्यात्; तत्रैवं सति देहात्मनोरसत्त्वं प्रसज्येत—तच्चानिष्टम् बैनाशिकपक्षत्वात् । अथ तद्विपर्ययेण देह आत्मन्यविद्ययाध्यारोपितः, देहस्यात्मनि सति असत्त्वं प्रसज्येत, तच्चानिष्टम्, प्रत्यक्षादिविरोधात् । तस्माद्देहात्मानौ नाविद्ययेतरेतरस्मिन्नध्यारोपितौ । कथं तर्हि ? वंशस्तंभवन्नित्यसंयुक्तौ ॥५५॥

  • णात्—पाठान्तरम् । † त्ययतयेतरे—पाठान्तरम् ।