उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२२ उपदेशसाहस्री के कारण सुषुप्ति-मरणावस्था भी प्रमाणनिरपेक्ष सिद्धिवाली होती । किन्तु ऐसी बात नहीं है, तस्मात् 'देह' अचेतन है। इसी प्रकार इन्द्रियों की सिद्धि भी प्रमाण के अधीन है। इस प्रकार देह में बताये गये न्याय का इन्द्रिय के सिद्धि में अतिदेश किया गया है। देह और इन्द्रियों के आकार में परिणत हुए शब्दादि विषय बाह्य ही हैं। अतः उनकी सिद्धि में प्रत्यक्षादि प्रमाण की अपेक्षा होती ही है। इस विषय में अनुमान इस प्रकार किया जायेगा- 'देहादिः अनात्मा भौतिकत्वात् बाह्यवत्' । ग्राह्य, ग्राहक, करण उनके आयन के रूप में भूतों का ही परिणाम होता है। क्योंकि 'उपकार्योपकारक भाव से परस्पर संहत हुए पदार्थ समानयोनि हुआ करते हैं, ऐसा नियम है। 'सिद्धि' का अर्थ निष्पत्ति नहीं है। यदि 'निष्पत्ति' अर्थ होता, तो उसे प्रत्यक्षादि की अपेक्षा न होती । 'सिद्धि' का अर्थ है प्रमाण की फलभूता अवगति, यह हम पूर्व कह चुके हैं। वह अवगति कूटस्थ, स्वयंसिद्ध, एवं स्वयंप्रकाशरूप है। यह कहकर अर्थात् अवगति का स्वरूप बताकर लोकायतिकों की शंका का निरसन कर दिया गया है। लोकायतिक का कहना था कि देहादि के आकार में भूतों के परिणत होने पर उनमें मदशक्ति की तरह अवगति उत्पन्न होती है, अतः उसे भी देह की तरह भौतिक ही समझ लेना चाहिये। इस शंका का निरसन हो जाने से अवगति की कूटस्थता ही स्थिर रहती है ॥ १०७ ॥
अत्राह चोदकः--अवगतिः प्रमाणानां फलं कूटस्थनित्यात्मज्योतिःस्वरूपेति च विप्रति- षिद्धम् । इत्युक्तवन्तमाह--न विप्रतिषिद्धम् । कथं तर्हि* ? कूटस्था नित्यापि सति प्रत्यक्षादिप्रत्ययान्ते लक्ष्यते तादर्थ्यात् । प्रत्यक्षादिप्रत्ययस्य अनित्यत्वे, अनित्येव †भवति । प्रमाणानां फलमित्युपचर्यते ॥१०८॥
हृदयस्पर्शिनी अत्रेति-इस पर प्रश्नकर्ता कहता है-'अवगति' को प्रमाणों का फल बताना और उसे कूटस्थ, नित्य एवं स्वयंप्रकाश कहना तो परस्परविरुद्ध है। इस प्रकार कहनेवाले शिष्य से गुरु कहते हैं-हमारा कथन परस्परविरुद्ध नहीं है। तब शिष्य ने पूछा कि आपने अवगति को प्रमाणों का फल कैसे कहा था ? गुरु कहते हैं-यद्यपि 'अवगति'- अकार्यरूप है, तथापि कृपाकाशाकार्यत्ववत् उसमें कार्यत्व का उपचार किया जाता है। अतः उसके फलत्वप्रसिद्धि में कोई विरोध नहीं है। उपचार करने में निमित्त क्या है ? तो उत्तर दे रहे हैं कि वह अवगति, कूटस्थ और नित्य रहने पर भी वह अपनी अभिव्यक्ति के लिये प्रत्यक्षादि ज्ञान के फलरूप से लक्षित होती है और प्रत्यक्षादि ज्ञान अनित्य होने के कारण वह भी अनित्य-सी होती है। यही कारण है कि वह अवगति उपचार के लक्षण के (लक्षणा के) द्वारा प्रमाणों के फलस्वरूप कही जाती है। तस्मात् कूटस्थावगतिरूप आत्मा में प्रमातृत्व, कर्तृत्व, फलत्व यह सब कल्पना मात्र है। देहादि संहत पदार्थों में परार्थता, जाड्य, पराधीनसिद्धिता रहती है ॥ १०८ ॥
यद्येवं भगवन्, कूटस्थनित्यावगतिरात्मज्योतिःस्वरूपैव स्वयंसिद्धा, आत्मनि प्रमाणनिरपेक्षत्वात् ततोऽन्यदचेतनं संहत्यकारित्वात्परार्थम् । येन च सुखदुःखमोहहेतुप्रत्ययावगतिरूपेण परार्थ्यं, तेनैव स्वरूपेणानात्मनोऽस्तित्वं, नान्येन रूपान्तरेण । अतो नास्तित्वमेव परमार्थतः । यथा हि लोके रज्जुसर्प- मरीच्युदकादीनां तदवगतिव्यतिरेकेणाभावो दृष्टः, एवं जाग्रत्स्वप्नद्वैतभावस्यापि तदवगतिव्यतिरेकेणाभावो युक्तः । एवमेव परमार्थतः भगवन्, अवगतेरात्मज्योतिषो नैरन्तर्यभावात्कूटस्थनित्यताऽद्वैतभावश्च, सर्वप्रत्ययभेदेष्वव्यभिचारात् । प्रत्ययभेदाश्चावगतिं व्यभिचरन्ति । यथा स्वप्ने नीलपीताद्याकारभेदरूपाः प्रत्ययास्तदवगतिं व्यभिचरन्तः परमार्थतो न सन्तीत्युच्यन्ते, एवं जाग्रत्यपि नीलपीतादिप्रत्ययभेदास्ता- मेवावगतिं व्यभिचरन्तोऽसत्यरूपा भवितुमर्हन्ति । तस्याश्चावगतेरन्योऽवगन्ता नास्तीति न स्वेन स्वरूपेण स्वयमुपादातुं हातुं वा शक्यते, अन्यस्य चाभावात् ॥१०९॥
* तर्हि अवगतेः फलत्वं ? तत्त्वोपचारात्-अधिकः पाठः । † तेन प्रमा०-पाठान्तरम् ।