भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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उपोद्घातप्रकरणम् १५ अपेक्षित ब्रह्मविद्या के सम्पादनार्थ यह परा उपनिषत् अर्थात् वेदान्तभाग का प्रारंभ किया गया है। यहाँ पर 'उपनिषत्' शब्द का प्रयोग लक्षणा से वेदान्तग्रन्थों के लिये किया गया है। श्लोक में आया हुआ 'संसारविनिवृत्तये' पद 'अज्ञानहान' का विशेषण है। अर्थात् 'संसार की सम्यक् निवृत्ति जिससे होती है' यह विग्रह है। इस प्रकार इसे विशेषण कहने पर उसका नपुंसकलिङ्ग में प्रयोग करना चाहिये था। अतः उसके अक्लीबत्व प्रयोग को आर्ष समझना चाहिये। एवं च ब्रह्मविद्या स्वतंत्ररूप से कार्यसहित अज्ञान की निवर्तक है, यह स्पष्ट हो जाता है ॥ २५ ॥ सदेरुपनिपूर्वस्य क्विपि चोपनिषद्भवेत् । मन्दीकरणभावाच्च गर्भादेः शातनात्तथा ॥ २६ ॥ सदेरिति—उप और नि उपसर्गपूर्वक 'सद्' धातु से 'क्विप्' प्रत्यय करने पर 'उपनिषद्' शब्द की निष्पत्ति होती है और गर्भ, जन्म, जरा, मरण को शिथिल करने तथा उनकी समाप्ति करने के कारण भी इसे उपनिषद् कहते हैं ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'उपनिषद्' नाम के निर्वचन से भी स्पष्ट होता है कि ब्रह्मात्मविद्या स्वतन्त्र रूप से मोक्ष की कारण है। 'षदॢँ (सद्) विशरण-गत्यवसादनेषु'—विशरण, गति, अवसादन अर्थ में 'षदॢ' धातु है और सामीप्य अर्थ में 'उप' तथा निश्चय अर्थ में 'नि' उपसर्ग हैं। एवं च उप + नि + सद् धातु से कर्त्रर्थ में (कर्ता के अर्थ में) 'क्विप्' प्रत्यय के करने पर 'उपनिषद्' पद सिद्ध होता है। 'षदॢ' धातु के तीनों अर्थ ब्रह्मविद्या में संभव होते हैं। अतः मुख्यवृत्ति से ब्रह्मविद्या को ही उपनिषद् कहते हैं और ब्रह्मविद्या के लिये ही ग्रन्थ के होने से उसे (ग्रन्थ को) भी उपनिषद् कहते हैं। उपर्युक्त धातु के तीनों अर्थों का ब्रह्मविद्या में उपयोग इस प्रकार होता है—(१) जो मन्दविद् हैं, उनके गर्भ, जन्म, जरा आदि को 'उपनिषादयति' अर्थात् शिथिल करती है वह ब्रह्मविद्या, इसलिये उसे 'उपनिषद्' कहा जाता है। (२) जिज्ञासुओं को उनके समीप एवं निश्चित रूप से ब्रह्म की प्राप्ति करा देती है वह ब्रह्मविद्या, इसलिये उसे 'उपनिषद्' कहा जाता है। (३) ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार किये हुए तत्त्वविदों के सबीज गर्भादि का नाश कर देती है, वह ब्रह्मविद्या, इस कारण उसे उपनिषद् कहा गया है। इस प्रकार ब्रह्मविद्या में ही धात्वर्थ के संघटित हो पाने से उसी (विद्या) में उपनिषद्वाच्यता सिद्ध होती है। निष्कर्ष यह है कि ब्रह्मविद्या की उपनिषत् नाम से प्रसिद्धि होने के कारण, मोक्ष की हेतुभूत उस ब्रह्मविद्या के प्रतिपादक वेदान्तग्रन्थों को भी 'लाङ्गलं जीवनम्' की तरह 'उपनिषद्' शब्द से कहा जाता है ॥ २६ ॥ ॥ इति उपोद्घातरूपं प्रथमं चैतन्यप्रकरणं समाप्तम् ॥