उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ उपदेशसाहस्री क्योंकि ज्ञानी का भिक्षाटनादि व्यापार अन्यकर्मा है। उसके भिक्षाटनादि व्यापार में ज्ञानी का वह प्रारब्धकर्म कारण है, जिसका फल अन्यत्र प्रवृत्त है। इसलिये उसका भिक्षाटनादि व्यापार 'अन्यकर्मा' है। भिक्षाटनादि कर्म तो तत्त्वज्ञान के अविरुद्ध प्रारब्धफलकर्मनिबन्धन है। किन्तु विधिविहित कर्म, तत्त्वज्ञान के विरोधी होने के कारण उस प्रकार के नहीं हैं। तथापि एक शंका अभी अवशिष्ट है कि ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति अपने मूल अहंकार के सहित होती है; अतः आश्रयभूत अहंकार की निवृत्ति हो जाने से तदाश्रित संचित कर्म की भी निवृत्ति जब हो रही है तो प्रारब्धकर्म की भी निवृत्ति हो जानी चाहिये। जिस प्रारब्धकर्म के कारण ज्ञानी की भिक्षाटनादि कर्म में प्रवृत्ति होती है, उस प्रारब्ध कर्म की निवृत्ति तत्त्वज्ञान से क्यों नहीं होती ? इस शंका का उत्तर दीजिये ॥ २ ॥ देहाद्यारम्भसामर्थ्याज्ज्ञानं सद्विषयं त्वयि । अभिभूय फलं कुर्यात्कर्मान्ते ज्ञानमुद्भवेत् ॥३॥ देहादीति—प्रारब्धकर्म में देहोत्पादन (देहारंभ) सामर्थ्य है। अतः वह ज्ञानी के सद्वस्तु (ब्रह्म) विषयक ज्ञान को अभिभूत करके अपना फल देता है। उस प्रारब्ध कर्म की फलभोग के द्वारा समाप्ति होने पर ही प्रतिबन्ध- शून्य ज्ञान का आविर्भाव होता है ॥ ३ ॥ पूर्वोक्त अवशिष्ट आशंका का उत्तर दे रहे हैं—ब्रह्मात्मविषयक ( सद्द्विषयक ) ज्ञान, वेदान्तवाक्यरूप प्रमाण से उत्पन्न होने के कारण यद्यपि प्रबल है, तथापि उसे यह प्रारब्धकर्म, विदेहकैवल्यरूप फल नहीं देने देता, क्योंकि इस प्रारब्धकर्म में देहारंभ (देहोत्पादन) का सामर्थ्य प्रबलतर है। अतः यह प्रारब्धकर्म देहाभास, जगदाभासरूप अपना फल तुम जैसे ज्ञानी को भी अवश्य देगा। प्रारब्धकर्मजन्य फलभोग की समाप्ति होने पर ही प्रतिबन्धरहित ज्ञान उद्भूत होता है। और वह वर्तमानकार्यसंपादक अविद्यालेश ( अविद्यासंस्कार ) की भी निवृत्ति कर देता है तथा उस ज्ञानी को स्वाराज्य पर स्थापित कर देता है ॥ ३ ॥ आरब्धस्य फले ह्येते भोग ज्ञानं च कर्मणः । अविरोधस्तयोर्युक्तो वैधर्म्यं चेतरस्य तु ॥४॥ आरब्धस्येति—भोग और ज्ञान दोनों ही प्रारब्ध कर्म के फल हैं। अतः उनमें अविरोध अर्थात् विरोध न रहना ठीक हो है। किन्तु प्रारब्धातिरिक्त अन्य कर्मों का ज्ञान से विरोध है। अतः उन्हीं का ज्ञानाग्नि से दाह हो पाता है, प्रारब्धकर्म का नहीं। उन प्रारब्ध कर्मों का क्षय (नाश) फलभोग से ही होता है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी पुनः शंका होती है कि आरब्ध कर्म हो या अनारब्ध कर्म हो, दोनों ही समानरूप से अज्ञानकार्य हैं। अज्ञान की निवृत्ति होने पर दोनों का ही आश्रय समान रूप से निवृत्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि प्रारब्धकर्मवशात् ज्ञानी को भी भोग भोगना पड़ता है और अनारब्ध कर्म तथा उसके फल की स्थिति ज्ञानी में नहीं होती, यह कैसे संभव हो सकता है ? इस शंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा दिया जा रहा है—भोग और ज्ञान दोनों ही आरब्धकर्म के फल हैं। अतः दोनों ( भोग और ज्ञान ) में अविरोध रहना उचित ही है, किन्तु अनारब्ध- फलवाले संचित तथा क्रियमाण कर्मों का तो ज्ञान के साथ विरोध है ही, क्योंकि दोनों में वैपरीत्य है, वैधर्म्य है। ज्ञान को शरीरादि की अपेक्षा करनी ही पड़ती है, जो शरीरादि अपने कारणभूत अज्ञान से पैदा होते हैं। जिसने शरीर धारण न किया हो ऐसे अशरीरी में आगन्तुक ( अकस्मात् ) ज्ञान का होना संभव नहीं। ज्ञान का कारण और शरीर आदि का कारण एक नहीं हो सकता। क्योंकि अन्य का कारण किसी अन्य की उत्पत्ति में हेतु नहीं हो सकता, सभी कार्यों के अपने अपने कारण नियत होते हैं। अतः कुछ कर्मविशेषों के द्वारा ज्ञानोत्पत्तियोग्य शरीरविशेषों में अपना फल देना आरंभ कर दिये जाने पर उस शरीरविशेष का आश्रय करके ज्ञान के हेतुभूत कर्म, 'ज्ञान' का आरंभ करते हैं यह स्वीकार करना होगा। देह के होने पर उससे भोग होना अवश्यंभावी है। अतः भोगप्रद कर्म के द्वारा उत्पन्न हुए शरीर (देह) का आश्रय कर अपने हेतुभूत प्रारब्धकर्म से आसादित (प्राप्त) ज्ञान, अज्ञाननिवृत्तिरूप अपने फल को उत्पन्न करता है, तथापि एकमात्र भोग के ही द्वारा नष्ट होने वाले देहारंभक प्रारब्धकर्म से आक्षिप्त जो अविद्या-