भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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निष्क्रिय है, तथापि बुद्धि के चलने पर वही (आत्मा ही) चलता हुआ-सा प्रतीत होता है, उसी तरह उसके (बुद्धि के) निश्चल होनेपर (ध्यान करने पर ) आत्मा ही निश्चल-सा ( ध्यान करता हुआ-सा) भासित होता है। वस्तुतः वह (आत्मा) ध्यान नहीं करता, क्योंकि चलन-क्रिया ही जब उसमें नहीं है, तब तत्प्रतियोगिक नैश्चल्य (निश्चलता) का भी उसमें न रहना स्वाभाविक है। विकारशील बुद्धि के अविवेक के कारण आरंभ में ही 'संसारी अहमस्मि' मैं संसारी हूँ, इस प्रकार के विपरीतनिश्चयरूप दोषवशात् लोग, आत्मा की ब्रह्मरूपता श्रुति के द्वारा बताई जाने पर भी उसे नहीं ग्रहण कर पाते। अविवेक के कारण होने वाले विपरीत ज्ञान में नौका का दृष्टान्त दिया गया है। एवंच अविवेक से आत्मा में संसारित्वभ्रान्ति लोगों को हुआ करती है ॥ २ ॥ नौस्थस्य प्रातिलोम्येन नगानां गमनं यथा । आत्मनः संसृतिस्तद्वद्ध्यायतीवेति हि श्रुतिः ॥३॥ नौस्थस्येति - जिस प्रकार नांव में बैठे हुए व्यक्ति को तीरवर्ती वृक्षों का विपरीत दिशा में जाना प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मा के संसरण की प्रतीति होती रहती है। इसी अभिप्राय को 'ध्यायतीव' इस श्रुति ने भी कहा है ॥३॥ हृदयस्पर्शिनी द्वितीय श्लोक की बात को ही पुनः दुहरा रहे हैं- जल में चलती नांव में बैठे व्यक्ति को उपाधि का विवेक न होने से अपनी नांव की गति की दिशा के ठीक विपरीत दिशा की ओर चलते हुए जलाशयतीरवर्ती पर्वत, वृक्ष आदि दिखाई देते हैं, उसी तरह असंसारी आत्मा की संसृति का अनुभव होता है। इसी अभिप्राय को "ध्यायतीव" श्रुति ने भी बताया है ॥ ३ ॥ चैतन्यप्रतिबिम्बेन व्याप्तो बोधो हि जायते । बुद्धेः शब्दादिभिर्भासस्तेन मोमुह्यते जगत् ॥४॥ चैतन्येति - प्रत्येक विषय का ज्ञान चिदाभास के द्वारा विषय के व्याप्त होने पर ही होता है। इसलिये बुद्धि को शब्दादि रूप से आत्मा को ही प्रतीति हो रही है। इस आत्मा-अनात्मा के अविवेक से ही जगत् अत्यन्त मोहित हो रहा है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में दृष्टान्त का वर्णन अच्छी तरह किया गया। अब इस श्लोक में दाष्टन्ति को अच्छी तरह बता रहे हैं- शुक्ति-रजत के समान बुद्धि-आत्मा में अध्यास की बात सुनकर मन में शंका उत्पन्न होती है कि शुक्ति में रजत का सादृश्य आदि संभव होने से 'अन्यत्र अन्यधर्माध्यास' का होना तो ठीक है, किन्तु विषय-विषयीरूप बुद्धि और आत्मा के अत्यन्त विलक्षण (एक दूसरे से अत्यन्त भिन्न) होने से उनमें अन्योन्यधर्माध्यास का होना कैसे संभव हो सकता है ? यदि कहें कि चिदाभास के द्वारा सादृश्य आदि का होना यहाँ भी संभव हो सकता है। किन्तु यह कहना ठीक न होगा, क्योंकि चिदाभास और विषयाकार दोनों का बुद्धि में संक्रमण होने से कृश-स्थूल आदि विषयधर्मों का आत्मा में अध्यास कर और आनन्द आदि आत्मधर्मों का बुद्धि में अध्यास (आरोप) कर मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ इस प्रकार लोकव्यवहार चलता रहता है। बुद्धि (अन्तःकरण) में पड़े हुए चैतन्य के प्रतिबिम्ब को ही 'चिदाभास' कहते हैं। उस चिदाभास से बुद्धि का बोध व्याप्त हुआ करता है, अर्थात् बुद्धि, विषयाकार (विषय के आकार की) हो जाती है। आत्मा को अपने आभास का विवेक न होने के कारण शब्दादि विषयों के द्वारा (बुद्धि की वृत्ति में व्याप्त विषयों के द्वारा) विषयभूत देहादि के रूप में अपना भास (स्फुरण) होता रहता है। श्लोक में 'शब्दादिभिः' यह इत्थंभाव अर्थ में तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया गया है। यदि “शब्दादिनिर्भासः" पाठ हो तो उसे "बोध" का विशेषण समझना चाहिए, और 'शब्दादिविषय का निर्भास है जिसमें' ऐसा बहुव्रीहि करना चाहिए। देहादि विषय और चैतन्य का बुद्धिवृत्तिरूप एक ही स्थान में संश्लेष-सा हो जाता है, तब एक-दूसरे का विवेक (भेदज्ञान) न हो पाने से संसारी लोग अत्यन्त मोहित रहते हैं। जैसे नाव में बैठे हुए व्यक्ति को नाव के चलने का अनुभव नहीं होता अपितु अचल वृक्षों के चलने का उपाधि के सामर्थ्य से अनुभव होता है। उसी प्रकार बुद्धिस्थित आत्मा देहात्मभाव को प्राप्त हुआ-सा उसके ४