उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम् ३९ हृदयस्पर्शिनी स्वरूपज्ञान भी तो 'ज्ञान' ही है, अतः उसका 'ज्ञेय'सापेक्ष रहना स्वाभाविक है, तब उसे निर्विषय कैसे कहा है ? स्वरूपज्ञान की निर्विषयता और नित्यता को श्रुति ने बताया है। अर्थात् सुषुप्ति अवस्था में विविध करणों का उपरम होने पर भी (किसी अन्य ज्ञेय के न रहने पर भी) तत्साक्षीभूत चैतन्य (ज्ञाता आत्मा) के विद्यमान रहने से उसका (आत्मा का) स्वरूपभूत ज्ञान (ज्ञप्ति) तो रहता ही है, अतएव श्रुति ने भी उसे नित्य कहा है१। तथापि पुनः शंका हो सकती है कि सुषुप्ति में विषय के न होने से ज्ञान यद्यपि निर्विषय है और स्वरूपतः उसका नाश न होने के कारण वह नित्य भी है, तथापि सुषुप्ति के अतिरिक्त अन्य अवस्थाओं में ज्ञाता का ज्ञान सविषय उपलब्ध होता है, अतः उसे अनित्य कहा जा सकता है। इस आशंका का समाधान ग्रन्थकार करते हैं कि जब भगवती श्रुति स्वयं कह रही है कि 'ज्ञान' निर्विषय और नित्य है, तब कहना होगा कि जाग्रत्कालीन विषय- दर्शनात्मक ज्ञान, अविद्या (भ्रान्ति) ही है, क्योंकि आत्मा, निर्विकार (विकार-रहित) है, अतः उसे ज्ञान का कर्ता नहीं कह सकते, और 'अन्तःकरण' जड़ होने से वह ज्ञान का आश्रय नहीं बन सकता । अतः सविषय ज्ञान को अध्यस्त ही मानना होगा, और उसके द्वारा ग्राह्य जितना भी विषय है, उसे भी असत् (अपरमार्थ) ही मानना होगा। अर्थात् जागरित अवस्था में उत्पत्तिशील जो ज्ञान और ज्ञेय हैं (ज्ञान-ज्ञेय विभाग है), वे दोनों ही अविद्या के कार्य होने से मिथ्या ही हैं। जागरितादि अवस्थाओं में भी बुद्धि की जो विषयाकार वृत्तियाँ हुआ करती हैं, वे स्फुरण से अवगुण्ठित रहती हैं। समस्त वृत्तियों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के साक्षी रूप में किसी एक नित्य स्फुरण को भी अवश्य मानना ही होगा। अतः कहना होगा कि जाग्रत् अवस्था में भी आत्मचैतन्य नित्य ही है। तथा विषयों का स्फुरण, वृत्तिसमकाल में ही होने से, प्रतीत होता है कि विषय का व्यभिचार (अभाव) रहने पर भी स्फुरण का अव्यभिचार रहता है, अर्थात् उसका व्यभिचार (अभाव) नहीं होता, इसीलिए वह (स्फुरण) विषय के द्वारा अनिरूप्य (निरूप्य नहीं) कहा जाता है। इस रीति से 'ज्ञान' की निर्विषयता स्पष्ट हो जाती है। तथा सुषुप्ति में भी करणों (इन्द्रियों) की उपरति की तरह विषय का भी “न तु तद् द्वितीयमस्ति" कहकर श्रुति ने निषेध किया है। अतः सुषुप्ति अवस्था में भी किसी भी विषय का ज्ञान न होने से केवल कूटस्थ ज्ञान ही एकमात्र सिद्ध होता है ॥८॥ रूपवत्त्वाद्यसत्त्वाच्च दृष्ट्यादेः कर्मता यथा । एवं विज्ञानकर्मत्वं भूम्नो नास्तीति गम्यते ॥९॥ रूपवत्त्वादीति—भूमा (आत्मा) में रूप आदि नहीं हैं (आत्मा रूपवान् न होने से उसमें रूपवत्त्व नहीं है)। रूप के न होने से वह नेत्र आदि का कर्म (विषय) नहीं हो सकता, उसी प्रकार वह (आत्मा) ज्ञान (विज्ञान) का भी कर्म नहीं हो सकता ॥९॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि आत्मा में श्रवण-मनन आदि की विषयता को तो श्रुति स्वयं कह रही है२। तब दर्शन- श्रवण-मनन आदि क्रियाओं का कर्म होने से उसे दृश्य मानना होगा। ऐसी स्थिति में उसे रज्जु-सर्प या शुक्ति-रजत के समान 'असत्' कहना होगा। किन्तु ऐसी शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि उसे दर्शनादि क्रियाओं का कर्म मानने पर३ अन्य श्रुति से विरोध होगा। जो रूप आदि से हीन (रहित) होता है, वह दर्शन आदि का विषय नहीं हुआ करता। 'द्रष्टव्यः' इत्यादि में अहार्थिक 'तव्य' प्रत्यय है, अतएव भगवती श्रुति ने आत्मा में दर्शनादि की अर्हता (योग्यता) को बताते हुए मनुष्य को उनकी अपनी अनात्मप्रवणता को त्यागने के लिए कहा है। द्रष्टव्यादि श्रुति का तात्पर्य आत्मा की १. 'यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्- विभक्तं यत् पश्येत् ।'—(बृ. उ. ४।३।२३) । २. आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः'—(बृ. उ. २४।५ ) ३. 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्'—(क. उ. ३।१५), तथा 'न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्त- पसा कर्मणा वा'—(मुं. उ. ३।१।८)