उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४३ साक्षी के रूप में रहने वाले मेरी ( मुझ आत्मा की ) अपनी-सी ( आत्मीय-सी ) या मेरे स्वरूप जैसी ( आत्मीयमिव या स्वरूपभूतमिव ) व्यावहारिक वस्तु कोई भी नहीं दिखाई देती । फिर भी व्यवहार में ( जाग्रत् आदि अवस्था में ) जो वस्तु मेरी आत्मीय-सी या मत्स्वरूप-सी प्रतीत होती रहती है, वह सब अविद्या ( अविवेक या मोहन ) से आरोपित ( अध्यारोपित ) है । क्योंकि जाग्रदादि अवस्थारूप या जाग्रदादि अवस्थाओं में दिखाई देनेवाली वस्तुओं की सत्ता न स्वतः है और न परतः ही है । अर्थात् उन वस्तुओं की सत्ता ( सत्त्व ) और उनका स्फुरण स्वयं हो नहीं सकता ( अन्य- निरपेक्ष सत्त्व संभव नहीं ), वह तो आगमापायी ( उत्पाद-विनाशशील ) है, अतः रज्जु-सर्प की तरह उसे ( सत्ता- स्फुरण को ) आरोपित ही समझना होगा । दृश्य वस्तुओं की सत्ता और स्फुरण को परतः भी नहीं कह सकते, क्योंकि इन जड़ (दृश्य) वस्तुओं से 'पर' एकमात्र 'चैतन्य' को ही कहना होगा । तब उस चैतन्य के रूप में इन वस्तुओं की सत्ता और स्फूर्ति तो हो नहीं सकती, क्योंकि दोनों के स्वभाव परस्परविरुद्ध हैं, अर्थात् 'चैतन्य' प्रत्यक् है और 'जड़ वस्तु' पराक् है । इस प्रकार विरुद्ध स्वभाव वालों का तादात्म्य (एकाकार) होना कभी संभव ही नहीं है । उनका तादात्म्य समझना केवल भ्रम ही है । सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाओं में भासित होने वाले प्राज्ञ, तैजस और विश्व ये मत्स्वरूपभूत (मेरे स्वरूप) नहीं हैं । मेरा स्वरूप तो 'तुरीय' है, क्योंकि विश्वादि तीनों की अपेक्षा परे (अतिरिक्त) हूँ, इसीलिये मुझे 'तुरीय, (चतुर्थ) कहते हैं । विश्व आदि तो केवल अपनी-अपनी अवस्थाओं के द्रष्टा (दर्शक) हैं, और 'मैं' सभी अवस्थाओं का द्रष्टा हूँ, इसलिये उनसे अतिरिक्त हूँ । स्थूल-सूक्ष्म के क्रम से विचारने पर विश्व आदि के तीनों स्थानों को भी पार करके यह रहता है इसीलिये इसे 'तुरीय' शब्द से कहा गया है । वस्तुतः इसमें 'तुरीयत्व' नहीं है, अर्थात् इसके अतिरिक्त तीन हैं, उनके अनन्तर होने से यह चौथा (तुरीय) है, यह नहीं समझना चाहिये । क्योंकि इसे 'अद्वय' कहते हैं, अर्थात् यह 'आत्मा' सदा निर्विशेष ही है ॥ ४ ॥ शरीरबुद्धीन्द्रियदुःख१ सन्ततिर्न मे न चाहं मम निर्विकारतः । असत्वहेतोश्च तथैव सन्ततेरसत्त्वमस्याः स्वप्नतो हि दृश्यवत् ॥५॥ शरीरेति— शरीर, बुद्धि, इन्द्रिय और दुःखपरम्परा (दुःखसन्तति ) का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है, और न मैं तत्स्वरूप हूँ, क्योंकि मैं विकाररहित (निर्विकार) हूँ । वह दुःखपरम्परा तो सोये हुए मनुष्य के स्वप्नजनित दृश्य के समान है । जैसे स्वप्नजनित दृश्य की कोई सत्ता नहीं, वैसे ही शरीरादि दुःखपरम्परा की भी कोई सत्ता नहीं है । अतः उसका मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में आत्मा की निर्विशेषता को 'अद्वय' शब्द से बताया गया था, किन्तु वह संगत नहीं हो पा रहा है, क्योंकि उससे शरीर आदि का सम्बन्ध सबके प्रत्यक्ष है । इस शंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा कर रहे हैं । वास्तव में यह शरीरादि परंपरा (सन्तति) न मत्स्वरूप है और न मेरी ही है । अर्थात् ये सब न मुझ आत्मा के धर्म हैं और न ये मत्स्वरूप (आत्मस्वरूप) ही हैं । क्योंकि मैं तो निर्विकार (विकार रहित) हूँ । अविक्रिय (विकाररहित) वस्तु, आगमापायी (उत्पाद-विनाशशील) शरीरादि के रूप में परिणत या उससे सम्बद्ध नहीं हुआ करती, जिससे उन जड़ वस्तुओं में तत्स्वरूपता (आत्मस्वरूपता) या तद्धर्मता (आत्मधर्मता) हो सके । इन जड़ वस्तुओं की पारमार्थिक (वास्तविक) सत्ता न हो सकने में एक अन्य हेतु भी है—स्वप्नावस्था के दृश्य के समान यह शरीरादि परम्परा भी दृश्य है । अतः स्वप्नदृश्य जैसे मिथ्या, वैसे ही यह शरीर-परम्परा भी मिथ्या समझनी चाहिये ॥ ५ ॥ इदं तु सत्यं मम नास्ति विक्रिया विकारहेतुर्न हि मेऽद्वयत्वतः । न पुण्यपापे न च मोक्षबन्धने न चास्ति वर्णाश्रमतोऽशरीरतः ॥६॥ इदमिति—यह तो सत्य ही है कि अद्वितीय होने के कारण मुझमें विकार नहीं है, न विकार का कारण ही है, तथा शरीर-रहित होने के कारण मुझमें पुण्य-पाप, मोक्ष-बन्ध तथा वर्णाश्रमधर्म भी नहीं है ॥ ६ ॥ १. सन्ततेर्न ०— पाठांतरम् ।