उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ेंदृशिश्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् ४७ सामान्य नियम के अनुसार चूंकि ब्रह्मात्मज्ञान होने से मोहराहित्य (अमोहता अर्थात् मूलभूत मोह का अभाव) होता है, उस कारण मोहमूलक जन्मादिलक्षणविचित्र संसार भी नहीं होता । क्योंकि जन्मादिविकार मोहपदवाच्य अविद्यामूलक हैं। जब मूलभूत अविद्या ही नहीं रहेगी, तब तत्कार्यभूत जन्मादि विकार भी नहीं होगा ॥ १० ॥ ममेदमित्थं च तथेदमीदृशं तथाहमेवं न परो न वान्यथा । विमूढतैवँ न जनस्य कल्पना सदा समे ब्रह्मणि चाद्वये शिवे ॥११॥ ममेति—मेरा यह शरीर ऐसा ( सुन्दर या असुन्दर ) है, यह शरीर इस प्रकार का ( स्थूल या सूक्ष्म ) है, मैं ऐसा (स्थूल या सूक्ष्म) हूँ, तथा अन्य पुरुष ऐसा (हृष्ट-पुष्ट) नहीं है, ऐसी कल्पना करते रहना लोगों की मूर्खता ही है, क्योंकि सदा समानरूप से स्थित, अद्वितीय शिवस्वरूप ब्रह्म में इन कल्पनाओं के लिये स्थान नहीं है ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मात्मज्ञान होने पर मोहनिवृत्ति होती है, और मोहनिवृत्ति होने पर मोहकार्यरूप संसार की निवृत्ति होती है, यह बता चुके । अब मोहकार्य के स्वरूप को बता रहे हैं। पहिले तो दोनों देहों (सूक्ष्म-स्थूल) का अहंकार, तदनन्तर बाह्य वस्तुओं (पदार्थों) की कल्पना, तदनन्तर शोभनादि का अध्यास, तदनन्तर यह मेरा, वह ऐसा (इस प्रकार का) है, उसी प्रकार यह मेरा नहीं, इत्यादि कल्पना, उसी तरह दूसरा भी इसी प्रकार का है, या इस प्रकार का नहीं है, अन्य प्रकार का है, या अन्य प्रकार का नहीं है, या यह मेरी या दूसरे की मूढ़ता है या सुज्ञता है— ये सब, अनादि-अज्ञान ( अविद्या ) से तिरोहित आत्मस्वरूप वाले मनुष्य को जन्मादि का सम्बन्ध होने पर जो कल्पनाएँ हुआ करती हैं, वे कल्पनाएँ सदा समान परमानन्दरूप शिव अद्वय ब्रह्म में कभी नहीं हुआ करतीं । एवंच यह विचित्र संसार अज्ञान का कार्य है ॥ ११ ॥ यदद्वयं ज्ञानमतीव निर्मलं महात्मनां तत्र न शोकमोहता । तयोरभावे न हि जन्म* कर्म वा भवेद्द्वयं वेदविदां विनिश्चयः ॥१२॥ यदिति—अत्यन्त निर्मल अद्वितीय ( अद्वय ) ज्ञान के उत्पन्न होनेपर महात्माओं ( महान् आत्माओं ) को शोक-मोह नहीं हुआ करते, और शोक-मोह के न होनेपर कर्म या जन्म नहीं होते –यह वेदवेत्ताओं का निर्णय है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मतत्त्व का ज्ञान होनेपर अज्ञान की निवृत्ति होती है। उससे इस विचित्र संसार की निवृत्ति हो जाती है, इसीको और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। अद्वयात्माकार ( अद्वय ) तथा असंभावना-विपरीतभावनादिप्रतिबन्ध से शून्य ( अतीव निर्मल ) ज्ञान के उदित होनेपर ब्रह्मभूत महात्माओं को शोक-मोहता संसारित्व नहीं रहता१। उन शोक-मोह के अभाव में ( न रहनेपर ) तदुपलक्षित ( उनके द्वारा सूचित ) उन शोक-मोह के कारणभूत अज्ञान की निवृत्ति होने- पर 'बीजाभावे फलाभावः' नियम के अनुसार जन्म-मरण पुनः नहीं हो सकते, यह वेदार्थज्ञ विद्वानों का निश्चय है । यही अभिप्राय श्रुति से भी अवगत होता है२ ॥ १२ ॥ सुषुप्तवज्जाग्रति यो न पश्यति द्वयं तु पश्यन्नपि चाद्वयत्वतः । तथा च कुर्वन्नपि निष्क्रियश्च यः स आत्मविन्नान्य इतीह निश्चयः ॥१३॥ सुषुप्तवदिति—आत्मा के अद्वितीयत्व का निश्चय हो जाने के कारण जो मनुष्य सुषुप्त ( सोये हुए ) पुरुष के समान जाग्रत् अवस्था में भी द्वैत का अनुभव नहीं करता तथा जो सब कुछ करते हुए भी निष्क्रिय रहता है, वही आत्मज्ञ है, अन्य कोई नहीं—यही वेदान्तशास्त्र का निर्णय ( निश्चय ) है ॥ १३ ॥ १. 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः'—( ई. उ. ७), २. 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे' ॥ ( मुं. उ. २।२।८ )
- कर्म जन्म०—पाठान्तरम् ।