उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ उपदेशसाहस्री समा०—वृत्तिमत् (वृत्तिविशिष्ट) अन्तःकरण के साथ अविवेक के होने से वैसा (अन्यथा) समझते हैं । अर्थात् उपाधिभूत दृश्यदृष्टि के साथ विवेक न होने के कारण (विवेकाऽग्रह होने से) व्यवहार दशा में उस नित्य शुद्ध आत्मदृष्टि को ही अविशुद्ध अनित्य समझते रहते हैं और अपने को सुखी-दुःखी मानते हैं ॥ ९ ॥ मूढया मूढ इत्येवं शुद्धया शुद्ध इत्यपि । मन्यते सर्वलोकोऽयं येन संसारमृच्छति ॥१०॥ मूढयेति—मूढ़ वृत्ति के साथ आत्मदृष्टि का अविवेक होने से 'मैं मूढ़ हूँ'—ऐसा संपूर्ण संसार समझता है । और शुद्ध वृत्ति का संसर्ग होने पर 'मैं शुद्ध हूँ'—ऐसा समझने लगता है। उस कारण उसे संसार की प्राप्ति होती है अर्थात् मिथ्या- भिमान [अविवेकनिबन्धन] ही संसारप्राप्ति है ॥ १० ॥ अचक्षुष्कादिशास्त्रोक्तं सबाह्याभ्यन्तरं त्वजम् । नित्यमुक्तमिहात्मानं मुमुक्षुश्चेत्सदा स्मरेत् ॥११॥ अचक्षुष्कादीति—यदि मोक्ष की इच्छा हो तो उसे “अचक्षुष्कम् अश्रोत्रम् अवाक् अगमनः” इत्यादि श्रुति के द्वारा बताये गये बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा एवं नित्यमुक्त आत्मा का स्मरण [मनन] करना चाहिये । अभिप्राय यह है कि संसारनिवृत्ति (मोक्ष) की यदि किसी को इच्छा हो तो उसे श्रुतिप्रतिपादित आचार्योपदिष्ट आत्मस्वरूप का अनवरत [निरन्तर] अनुसन्धान करते रहना चाहिये । इस प्रकार मोक्ष का उपाय [साधन] बताते हुए मुमुक्षु को इस पद्य के द्वारा शिक्षा दी गई है ॥ ११ ॥ अचक्षुष्कादिशास्त्राच्च नेन्द्रियाणि सदा मम । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र इति चाथर्वणं* वचः ॥१२॥ अचक्षुष्कादीति—अचक्षुष्कादि शास्त्र [बृहदारण्यक श्रुति] की प्रामाणिकता सुनिश्चित होने से सर्वदा ही मेरे इन्द्रियाँ नहीं हैं और उसी प्रकार 'आत्मा प्राणहीन, मनो-हीन, एवं शुद्ध है” ऐसा अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद् का भी वाक्य है ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में आत्मा की जो चक्षुरादिशून्यता बताई गई थी, उसी में अचक्षुष्कादि शास्त्ररूप बृहदारण्यक१ श्रुति को प्रमाण रूप में उपस्थित किया गया है । उसी प्रकार मुण्डकोपनिषद्२ में भी कहा गया है । एवंच आत्मा का प्राण से या मन से सम्बन्ध नहीं है ॥ १२ ॥ शब्दादीनामभावश्च श्रूयते मम काठके । अप्राणो ह्यमना यस्मादविकारी सदा ह्यहम् ॥१३॥ शब्दादीनामिति—मुझमें शब्दादि का अभाव सुना जाता है, तथा मैं प्राणहीन और मनो-हीन भी हूँ, अतः मैं सर्वदा ही अविकारी हूँ ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की निर्विशेषता में श्रुति का प्रमाण दे रहे हैं— “अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥” (कठ उ० १।३।१५) यह उपर्युक्त प्रमाण अचक्षुष्कादि का भी उपलक्षण है । एवंच प्राणादिकों के साथ सम्बन्ध न रहने से तथा अविकारी होने से मुमुक्षुत्व सिद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥ १. ( 'अचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनः'—बृ. उ. ३।८।८ ) २. ( मुं. उ. २।१।२ )
- णेर्व०—पाठान्तरम् ।