वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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अवर्यं यातारश्चिरतस्मुचित्वाऽपि विषया
वियोगे को भेदस्त्यजति न जना यत्सव्यभ्रमन् ॥
त्रजन्तः स्वातंन्यादुलुलपरितापाय मनसः
स्वयं त्यक्त्वा धेति शमसुसमनन्तं विदधति ॥१॥
विषयोंको हम चाहे जितने दिनोंतक क्यों न भोगें, एक दिन वे निश्चय ही हमसे अलग हो जायेंगे ; तब मनुष्य उन्हें स्वयम् अपनी इच्छासे ही क्यों न छोड़ दे ? इस जुदाईमें क्या फर्क है ? अगर वह न छोड़ेगा, तो वे छोड़ देंगे। जब वे स्वयं मनुष्यको छोड़ेंगे, तब उसे बड़ा दुःख और मनःकेश होगा। अगर मनुष्य उन्हें स्वयं छोड़ देगा, तो उसे अनन्त सुख और शान्ति प्राप्त होगी ॥१॥
जिन विषय-मुखाँको हम चिरकालसे भोगते आ रहे हैं, वे सदा हमारे साथ न रहेंगे ; निश्चय ही वे एक दिन हमारा साथ छोड़ देंगे। इससे, यदि हम ही उन्हें पहलेसे ही छोड़ दें, तो हमें महासुख और शान्ति मिलेगी। यदि हम न छोड़ेंगे और वे हमें छोड़ेंगे, तो हमें महादुःख और मनस्ताप होगा।
जो लोग विषयोंको पहले ही त्याग देते हैं, उन्हें उनके न होनेपर दुःख नहीं होता ; किन्तु जो उन्हें नहीं छोड़ते, उन्हें
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