भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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जराजीर्णैश्चर्यप्रसनाहनात्तेष्वप्यस्तुपापान्

यस्यां भवति मरुतामप्यधिपतिः ॥१७॥

जब ज्ञानका उदय होता है, तब शान्तिकी प्राप्ति होती है। शान्तिकी प्राप्तिसे तृष्णा शान्त हो जाती है, किन्तु वही तृष्णा विषयोंके संसर्गसे बेहद बढ़ती है। मतलब यह है, कि विषयोंसे तृष्णा कभी शान्त नहीं हो सकती। सुन्दरीके कठोर कुवोंपर हाथ लगानेसे काम-मद बढ़ता है, घटता नहीं। जराजीर्ण ऐश्वर्य्य के देवराज इन्द्र भी नहीं त्याग सकते ॥ १७ ॥

ज्ञानसेही तृष्णाका नाश और शान्ति की प्राप्ति होती है। विषयोंके भोगनेसे तृष्णा घटती नहीं, उल्टी बढ़ती है। जो तृष्णाको त्यागते हैं, तृष्णासे नफ़रत करते हैं, उसे पास नहीं आने देते, उनसे तृष्णा भी दूर भागती है। हम जब किसी स्त्रीको प्यार करते हैं, उसका आदर-मान करते हैं, तब वह हमारे बैठती है; किन्तु जब हम उससे मुँह फेर लेते हैं, उसे मुँह नहीं लगाते, उसे प्यार नहीं करते, उसे नफ़रत की नज़र से देखते हैं; तब वह भी हमसे अलग रहती है,—हमारे पास आनेको उसे हिम्मत नहीं होती। इसलिये जो तृष्णा से पीड़ा छुड़ाना चाहें, उन्हें विषयोंसे मुँह मोड़ लेना चाहिये। देखिये, यद्यपि स्वर्गके राज्यको भोगते लाखों-करोड़ों वर्ष बीत गये, तोभी इन्द्र उस स्वर्ग-राज्यको छोड़ नहीं सकता। जब इन्द्रकी भी तृष्णा लाखों-करोड़ों वर्ष राज्य भोगनेसे शान्त

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