भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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जाते हैं, वे अगर अपने रहें तो माता-पिताकी स्नेहा, आतिथ्य-सत्कार, पिण्डदान, ब्राह्मण-भोजन, सन्तानोत्पत्ति और कन्या-दान आदि गृहस्थके कर्म कर सकते हैं ; पर साधुवेष धारण करने से इन कामोंको नहीं कर सकते । दूसरी ओर, साधु होकर ईश्वर-भजन करना चाहिये, परपूर्विकि वे सच्चे साधु नहीं—काम, क्रोध, मद, मोह और लोभ उनसे अलग नहीं—इसलिये उनका चित्त स्थिर नहीं होता । चित्तके स्थिर न होनेसे, ईश्वरमें भी उनका मन नहीं लगता । पेट भरनेके लिए वे घर-घर मारे-मारे फिरते हैं । इस तरह वे न तो घरके रहते हैं न घाटके । तुलसीदासजी कहते हैं, उनकी गति बवण्डर या बगुलेके पत्तेकीसी होती है, जो न तो आकाशमें ही जाता है और न जमीन पर ही रहता है—अधपरमें उड़ता फिरता है । इस तरह जन्म गँवाना—मूर्खता नहीं तो क्या है ? जो लोग मिहन्त-भजदूरी करके कामा नहीं सकते और बैठे-बैठे मिलता नहीं, वे कुटुम्बका पालन न कर सकनेकी वजहसे साधु बन जाते हैं । फिर वे दरदर टुकड़े माँगते और टोकरे खाते हैं । ईश्वरपर भी उनका भरोसा नहीं । अगर परमात्मा पर भरोसा होता, तो वे ध्यानस्थ होकर उसीका जप करते और वह भी उनकी फिक्र करता । जो उसके भरोसे निर्जन और बयाबाँ जंगलोंमें भी जाकर बैठ जाते हैं, उनको वह वहीँ पहुँचाता है, इसमें सन्देह नहीं । वह उसका नाम न जपनेवालोंको ही पहुँचाता है ; तब उसके ही भरोसे रहनेवालों और उसीकी माला जपने वालोंको वह कैसे भूल सकता है ?

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