वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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करती है, उसी तरह ये नित्य नये पुरुषोंको चाहती है। जब तक इन्हें कोई चाहनेवाला नहीं मिलता या मौका हाथ नहीं आता, तभी तक ये सदा बनी रहती है। ये अपने सच्चे प्रेमी-कों नहीं चाहती, उससे घृणा करती हैं अथवा उदासीन रहती हैं; किन्तु जो इन्हें नहीं चाहता, जो इनके साथ चाले चलता है, जो परले खिरेका धूर्त और दगाबाज होता है, जो दुर्गुणों-की मूर्ति और दुष्टताकी खान होता है, उसके लिये ये अत्यातुर रहती है।
✓ जो पुरुष स्त्रियोंको सदुगुण-शालिनी और उत्तम लभनावाली समझते हैं, वे बड़ी गलती करते हैं। ये इतनी बालाक और मायाविनी होती हैं कि, अच्छेसे अच्छे बालाकको भी अपने कुकर्मोंका पता नहीं लगने देतीं। ये किसीकी भी बात-कों जान-नुनकर पेटमें नहीं पचा सकती, पर अपनी बातको छिपाना ये खूब जानती हैं। जब ये कुकर्मों पर उत्तर पड़ती है, तब इन्हें लोकलाज, लोकनिन्दा प्रभृतिकी परवा नहीं रहती। दुनियाँ बुलाई करे करो; माता पिता, भाई और जेठ ससुर प्रभृतिकी नाक-कटाई हो तो हो—यहाँ तक कि, इनके जीवनमें भी सन्देह हो जाय, तो हो जाय; पर ये जिस बातको धार लेती हैं, उससे पीछे कदम नहीं रखतीं। देखनेमें पुण्यवत् कोमल दीखती हैं, पर हृदय इनका वज्रवत् कठोर होता है। इनको किसी पर दया-माया नहीं। इन्हें तो अपनी कुवासना पूरी करनेसे मतलब। अपनी कुवासना