भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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व्यापारैः पुनरुक्तमुक्तविषयैरवविनेनामुना

संसारेण कर्दर्थिताः कथमहो मोहाच्च लज्जामहे ॥७८॥

प्राथियोर्मं बुद्धिमान यद्यपि जानते हैं कि दिन और रात ठीक पहलेकी तरह ही होते हैं ; तोभी वे उन्हीं काम-धन्धेके पीछे दौड़ते हैं, जिनके पीछे वे पहले दौड़ते थे । वे लोग उन्हीं-उन्हीं कामोंमें लगे रहते हैं, जिनसे क्षणिक और बारम्बार वही लाभ होते हैं, जिनके वे बारम्बार कह और भोग चुके हैं । आश्चर्य्यका विषय है, कि मनुष्योंको लज्जा नहीं आती ! ॥७८॥

देखते हैं, कि पहले की तरह ही दिन, रात, तिथि, वार, नक्षत्र और मास तथा वर्ष आते हैं और जाते हैं ; उसी तरह हम खाते-पीते, सोते-जागते और काम-धन्धे करते हैं ; कोई नई बात नहीं देखते । जिन कामों को पहले करते थे, उन्हेंही बारम्बार करते हैं । उनमें कितना सा लाभ और सुख है, इसे भी देखते-सुनते और समझते हैं । फिर भी ; आश्चर्य्य है कि, हम इस मिथ्या संसारसे मोह नहीं तोड़ते !

कुरुडलि्या ।

वेही निशि वेही दिवसः वेही तिथि वेही वार ।

वे उद्यम वेही क्रिया, वेही विषय-विकार ।

वेही विषय-विकार, सुनैत देखत अरु सूँघत ।

वेही भोजन भोग, जागि सोवत अरु ऊँघत ।