वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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तेरा मेरे पास हो तू ले।" वेश्याके संकल्प छोड़ते ही वह ज़मीनपर गिर पड़ी और मर गई। राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उसने उस लड़केसे इस घटनाका असली तत्व पूछा। लड़केने कहा—"राजन् ! यह मेरी न्याहता स्त्री है। मैं और यह घरसे निकल आये। राहमें इसे साँपने काटा, और यह मर गई, मैं भी इसीके साथ जलनेको तैयार हुआ। इतनेमें महादेव-पार्वती उधर आ निकले। पहले तो उन्होंने कहा—"अरे पागल ! स्त्रीके लिये जान देता है ! तू है तो और बहुत स्त्रियाँ मिल जायेंगी। पर मैं उनकी बातपर राजी न हुआ, तब उन्होंने कहा—"तू हाथमें जल लेकर अपनी आधी आयु इसे दे, तो यह जी सकती है। फिर भी, जब कभी तू अपनी शेष बची आयु इससे माँगोगा और यह संकल्प छोड़ देगी, तब यह मर जायगी। महाराजा मुझे यह प्राणांसे भी प्यारी थी ; अतः मैंने अपनी आधी आयु इसे देदी। इसके बाद यह मुझे कूपमें धकेल फ़कीरके साथ बड़ी आई और वेश्या हो गई। आज यह मुझे जानसे मरवाने पर ही तुल गई। स्त्री-जातिकी प्रीतिका ज़रा भी विश्वास नहीं।" राजा उससे बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना प्रधान मन्त्री बना लिया।
इस कहानीसे हमने स्त्रियोंकी प्रीतिका नमूना दिखाया है। निश्चय ही सभी स्त्रियाँ ऐसी नहीं होतीं ; पर इसमें शक नहीं कि, अधिकांश ऐसी ही होती हैं ; अतः स्त्री की