वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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suits. In one moment he is poor and in another the possessor of great wealth and power. Ultimately with limbs worn out with old age and a body covered all over with wrinkles he makes his exit entering the metropolis of the god of Death.
अहौ वा हारे वा बलवति रिषो वा सुहृदि वा ।
मणौ वा लोष्टे वा कुसुमशयनेवा दृषदि वा ॥
तृणे वा त्रैणे वा मम समदृशो यान्तु दिवसाः
कचित्पुण्यारण्ये शिवशिवशिवेति प्रलपतः ॥११२॥
हे परमात्मा ! मेरे शेष दिन, किसी पवित्र वनमें, “शिव शिव” रटते हुए बीतें ; सर्प और पुष्प-हार, बलवान शत्रु और मित्र, कोमल पुष्प-शय्या और पत्थरकी शिला, मणि और पत्थर, तिनका और सुन्दरी कामिनियोंके समूहमें मेरी समष्टि हो जाय, मेरी यही इच्छा है ॥११३॥
खुलासा—कोई विरक्त पुरुष परमात्मासे प्रार्थना करता है, कि मेरी मति ऐसी कर दे कि, मुझे सर्प और हार, शत्रु और मित्र, पुष्प-शय्या और शिला, रत्न और पत्थर, तिनका और सुन्दरी स्त्री सब एकसे दीखने लगे ; इनमें मुझे कुछ भेद न मालूम हो ; मैं समदर्शी हो जाऊँ और मेरा शेष जीवन किन्हीं पवित्र वनमें “शिव शिव शिव” जपते बीते ।
जब सभी शरीरोंमें एकही व्यापक ब्रह्म दीखने लगे ; शत्रु-मित्रमें भेद न मालूम हो ; हर्ष-शोक और दुःख-सुख सबमें