वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १७ )
अभिमान त्यागकर, पराई चाकरी भी की ; पर उससे भी कुछ न मिला । शेषमें, मैं कन्वेकी तरह डरता हुआ और अपमान सहता हुआ परायें घरोंके टुकड़े भी खाता फिरा । हे पाप-कर्म कराने वाली और कुमतिदायिनी तुम्झे ! क्या तुम्हे इतने पर भी सन्तोष नहीं हुआ ? ॥५॥
धनके लालचमें, मैं अपना देश और घर-द्वार छोड़कर ऐसे-ऐसे स्थानोंमें गया, जहाँ मनुष्य बड़ी कठिनाईसे पहुँच सकते हैं ; पर वहाँ जानेपर भी मुझे एक पाई न मिली । मैंने अपने द्विजत्व या ऊँची जातिके अभिमानको त्यागकर पराई नौकरी भी की और मालिकने जो-जो नीच कर्म कराये वही किये, लेकिन उससे भी मुझे धन न मिला । शेषमें, मैं मान-अपमान को छप्पर पर रखकर, बिना बुलाये ही लोगोंके घर गया और कन्वेकी तरह डरते-डरते खाता रहा । मुझे इन सब कामों से बड़ी ठेस लगी । मैंने अनेक प्रकारके कष्ट उठाये, मान खोया, लोगोंके कुवचन सहे, पर फिर भी मेरी कामना सिद्ध न हुई ! इसलिये कम्बल तृष्णा ! मैं तुफ़से पूछता हूँ कि, इतने कुकर्म करारकर भी तुम्हे सन्तोष हुआ या नहीं ?
छप्पय ।
भटको देश-विदेश, तहाँ फल कछुहू न पायो ।
निज कुलको अभिमान छोड़, सेवा चित लायो ॥
२