भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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९८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद धनुष के रोदे से छूटे हुए बाण से उस बाण के गिरने तक बीच में अनेक कर्म होते हैं, उनका हेतु क्या है ? उत्तर- अनेक समयों में होने वाले अनेक संयोग उन अन्य अनेक कर्मों का कारण होते हैं। कल्पना करो कि किसी धनुर्धरी ने धनुष में बाण लगाकर और बलपूर्वक आकर्णान्त खींच कर एक बाण चलाया और वह बाण रोदे से छूटकर इतने बल से आगे बढ़ा कि आधे कोस पर भूमि पर गिरेगा। बीच में कहीं वृक्षों की पत्तियों में को और कहीं लघुकाय पक्षियों में को होकर बाण निकला चलागया तो बाण के छोड़ने में प्रथम कारण धनुर्धारी के आत्मा, मन, हाथ और धनुष की प्रत्यञ्चा; ये चार कारण हैं, परन्तु बीच में आने वाले वृक्षों की पत्तियों में छिद्र होना और पक्षियों के देहों का बिन्धना इत्यादि अनेक कर्मों का कारण बीच में होने वाले अनेक संयोग हैं ॥ १६ ॥ प्रश्न-किस २ कारण से बाण के गिरने तक बाण में अनेक कर्म उत्पन्न होते हैं ? उत्तर- १९९-नोदनादाद्यमिषोः कर्म, तत्कर्मकारिताच्च संस्कारादुत्तरं तथोत्तरमुत्तरं च ॥ १७ ॥ ( नोदनात् ) प्रेरणा से ( इषोः ) बाण का ( आद्यम् ) पहला ( कर्म ) काम आरम्भ होता है ( च ) और ( तत्कर्मकारितात् ) उस कर्म के कर्त्ता पने से (संस्कारात् ) संस्कार वश ( उत्तरम् ) अगला ( तथा ) इसी प्रकार ( उत्तरम् ) अगला ( च ) और ( उत्तरम् ) अगला [ कर्म उत्पन्न होता है ] ॥ जब बाण को प्रेरणा से छोड़ते हैं तब बाण के चलने में प्रेरणा कारण होती है, फिर बाण का चलना और वृक्षादि की पत्तियों का संयोग उन के बिन्धने का कारण होता है, इसी प्रकार आगे २ होने वाले कर्मों का कारण उन के पिछले २ कर्म होते हैं ॥ १७ ॥ परन्तु- २००-संस्काराभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ १८ ॥ ( संस्काराभावे ) संस्कार के न रहने पर ( गुरुत्वात् ) भारी होने से ( पतनम् ) पतन हो जाता है ॥ जब बाण में धनुर्धारी की प्रेरणा का बलसंस्कार समाप्त हो जाता है तब बाण अपने बोझ से आप गिर पड़ता है अर्थात् पृथिवी की आकर्षण शक्ति से पृथिवी की ओर खिंच जाता है ॥ १८ ॥ जिस प्रकार लोक में हर एक कर्म किसी प्रयत्न का परिणाम होता है वही बात प्रसङ्गवश इस आह्निक में अच्छे प्रकार से वर्णित की गई है ॥ इति पञ्चमाध्याये प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥

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