भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 160 में से

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[ तब ] ( शरीरस्य ) शरीर को ( दुःखाभावः ) दुःख नहीं रहता ( सः ) वह ( योगः ) योग कहाता है ॥ अर्थात् योग उस अवस्था का नाम है जब कि मन अपने आपे में ही ठहर जावे और इन्द्रियों को प्रेरणा न करे और इन्द्रियां मन की सहायता न पाकर विषयों को न छुवें तब आत्मा को दुःख नहीं पहुंच सकता । यद्यपि योगदशा में जैसे इन्द्रियों और विषयों का स्पर्श होने से आत्मा को विषयों का दुःख नहीं पहुंच सकता, इसी प्रकार विषयों का सुख भी तौ नहीं पहुंच सकता ? तौ भी सूत्रकार ने केवल दुःख का अभाव कहा है, सुख का अभाव नहीं कहा, सो क्यों ? उत्तर-सुख का अभाव इस लिये नहीं कहा कि साधारण पुरुषों को दूसरे शब्दों में लौकिक पुरुषों को जिन रूपादि विषयों से सुख की प्रतीति होती है, उन्हीं विषयों से योगी को दुःख की प्रतीति होती है क्योंकि योगी का आत्मा योगसाधन की क्रिया करते २ ऐसा सुकुमार=नाजुक हो जाता है कि जो स्थूल विषय अन्यों को सुखदायक प्रतीत होते हैं वे ही विषय योगी को दुःखदायक प्रतीत होते हैं । इस में दृष्टान्त यह है कि जैसे मकड़ी का जाला जो रेशम से भी नरम होता है, अङ्गुली से छूने में कैसा सुखदायक प्रतीत होता है क्योंकि अङ्गुली का चमड़ा बड़ा मोटा और गंवार है । परन्तु वही मकड़ी का जाला यदि आंख से छू जावे तो आंख को सुखदायक होने के बदले दुःखदायक प्रतीत होता है क्योंकि आंख अङ्गुली के चमड़े की नाईं गंवार नहीं है किन्तु नगरनिवासियों के समान सुकुमार है । बस ऐसे ही योगी की दृष्टि में सब विषयों के सुख भी अपनी सुकुमारता के कारण दुःखों ही की गिनती में हैं। इस लिये सूत्रकार ने स्थिरचित्त योगी को केवल दुःख का अभाव कहा, सुख का अभाव नहीं कहा ॥ १६ ॥ अब मन की अन्य क्रियाओं को वर्णित करते हैं जो अदृष्ट=न देखे हुए प्रारब्धकर्मसंस्कार से होती हैं- २१७-अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगाः कार्यान्तरसंयोगाश्चेत्यदृष्टकारितानि ॥ १७ ॥ ( अपसर्पणम् ) बाहर निकलजाना ( उपसर्पणम् ) समीप चलाजाना ( अशितपीतसंयोगाः ) खाये पिये के संयोग (च) और (कर्मान्तरसंयोगाः) अन्य कर्मों के साथ अनेक संयोग; [ ये सब ] ( अदृष्टकारितानि ) बिना देखे पूर्व जन्मकृत पाप पुण्यों से बने प्रारब्ध संस्कार से कराये हुए होते हैं।