वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 14, कुल 160 में से
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१० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १२-न द्रव्यं कार्यं कारणं च बध्नाति ॥ १२ ॥ ( कार्यं ) कार्य ( च ) और (कारणं) कारण (द्रव्यं) द्रव्य को (न) नहीं ( बध्नाति ) नष्ट करता ॥ कोई कार्य कार्यद्रव्य का नाश नहीं करता, और कोई कारण, कारण द्रव्य का नाश नहीं करता । 'बध्नाति' यह आर्ष प्रयोग 'हिनस्ति' के स्थान में है ॥ १२ ॥ अब गुणों का प्रकार बताते हैं- १३-उभयथा गुणाः ॥१३ ॥ ( गुणाः ) गुण ( उभयथा ) दोनों प्रकार के हैं ॥ अर्थात् गुणों में दोनों प्रकार हैं, वे कार्य का नाश भी करते हैं, तथा कारण का भी । जैसे शब्द एक गुण है; उस पहले शब्द को उस का कार्य ( दूसरा शब्द ) नष्ट कर देता है । और अन्त के शब्द को उस का कारण वही उपान्त्य (अन्त से पूर्वला ) शब्द नष्ट कर देता है ॥ १३ ॥ प्रश्न-और कर्म कैसा होता है ? उत्तर- १४-कार्यविरोधि कर्म ॥ १४ ॥ ( कार्यविरोधि ) जिस का विरोधी कार्य हो, ऐसा ( कर्म ) कर्म है ॥ कोई कर्म ऐसा नहीं होता जिस का नाश उस के कार्य से न हो जाय । सभी कर्म अपने कार्य से नष्ट होजाते हैं । क्योंकि कर्म, विभाग को उत्पन्न करके और अगले संयोग को उत्पन्न करके अवश्य स्वयं नष्ट होजाता है ॥ १४॥ प्रश्न-जिस द्रव्य का यह प्रकार कहा गया कि उस को न तो कार्य नष्ट करता, न कारण, उस ( द्रव्य ) का लक्षण क्या है ? उत्तर- १५-क्रियागुणवत् समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम् ॥१५॥ जो ( क्रियागुणवत् ) क्रिया वाला और गुणों वाला हो, ( समवायि कारणं ) संग रहने वाला कारण हो ( इति ) यह ( द्रव्यलक्षणम् ) द्रव्य का लक्षण=पहचान है ॥ यदि-एकला क्रिया वाला कहते तो आकाश क्रिया वाला नहीं, तब उस में अव्याप्ति दोष आता, इस लिये दूसरा लक्षण गुणों वाला कहा गया और नैयायिक कहते हैं कि "जायमानं हि द्रव्यं क्षणमगुणं तिष्ठति "=कार्य द्रव्य
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