भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

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ॐ अथ दशमोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् ३५७-इष्टानिष्टकारणविशेषाद्विरोधाच्च मिथः सुखदुःखयोरर्थान्तरभावः ॥ १ ॥ (इष्टानिष्टकारणविशेषात्) इष्ट और अनिष्ट विशेष कारण से (च) और (मिथः) एक दूसरे में (विरोधात्) विरोध से [सिद्ध है कि] (सुखदुःखयोः) सुख और दुःख में (अर्थान्तरभावः) एक दूसरे से भिन्नता है ॥ १ ॥ ३५८-संशयनिर्णयान्तराभावश्च ज्ञानान्तरत्वे हेतुः ॥ २ ॥ (च) और (संशयनिर्णयान्तराऽभावः) संशय और निर्णय के बीच में कोई अन्य प्रत्यय नहीं है, [सुख वा दुःख जिस में समझे जावें] यही (ज्ञाना- न्तरत्वे) सुख दुःख के भिन्न ज्ञान होने में (हेतुः) कारण है ॥ २ ॥ ३५९-तयोर्निष्पत्तिः प्रत्यक्षलैङ्गिकाभ्याम् ॥ ३ ॥ (तयोः) उन सुख दुःखों की (निष्पत्तिः) उत्पत्ति (प्रत्यक्षलैङ्गिकाभ्याम्) प्रत्यक्ष और अनुमान से होती है ॥ जिस प्रकार इन्द्रियार्थसंनिकर्ष से और लिङ्ग से प्रत्यक्ष और अनुमान ज्ञान उत्पन्न होते हैं, इसी प्रकार मन चाहे विषय के सामीप्य से वा मन चाहे विषय की प्राप्ति की आशा दिलाने वाले चिन्हों से सुख दुःख उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ ३६०-अभूदित्यपि ॥ ४ ॥ (अभूत्) भूतकाल में हुआ था (इति) इस से (अपि) और भविष्यत् में होगा, इस से भी [सुख और दुःख की उत्पत्ति होती है] ॥ पूर्वानुभूत सुखसाधनों से सुख और दुःखसाधनों से दुःख होता है और होने वाले भविष्यद्वृत्तियों से भी उस की आशा से होता है ॥ ४ ॥ ३६१-सति च कार्यादर्शनात् ॥ ५ ॥