वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद पूर्व सूत्र २१ में-"न द्रव्याणां कर्म" और ११ में-"कर्म कर्मसाध्यं न विद्यते" कह चुके हैं, जिन का तात्पर्य यही है कि न तो कर्म कर्मों का कारणकार्य- भाव होता, न द्रव्यों का कारण कर्म होता। इस लिये यहां उस के पुनर्वार कहने की आवश्यकता नहीं ॥ ३१ ॥ श्री स्वामी हरिप्रसाद जी का श्लोक इस आह्निक का संक्षिप्त आशय बताने और याद रखने में बड़ा उपयोगी है। इस लिये उस को ज्यों का त्यों उद्धृ- धृत करता हूं कि पाठक लाभ उठावें- “मेयोद्देशो विभागोऽथ सामान्यं च विशेषकम् । अर्थस्य लक्षणं चास्मिन्नान्हिके संप्रकीर्त्तितम् ॥ १॥” अर्थात् इस आन्हिक में प्रमेय पदार्थों के नाम और विभाग, सामान्य और विशेष और अर्थ का लक्षण वर्णन किया गया ॥ इति प्रथमाऽध्यायस्य प्रथममाह्निकम् ॥ अथ प्रथमाऽध्याये द्वितीयमाह्निकम् पूर्व आन्हिक में यह तो कहा गया कि द्रव्य गुण कर्म का कारण सामान्य यह है, कार्य सामान्य यह है, परन्तु कार्य कारण का स्वरूप नहीं बताया गया, इस कारण कारण कार्य सामान्य का समझना कठिन रहा, उस को सरल करने के लिये इस आन्हिक में कार्य कारण स्वरूपादि का ही वर्णन आरम्भ करते हैं:- ३२-कारणाऽभावात्कार्याऽभावः ॥ १ ॥ (कारणाभावात्) कारण के अभाव से (कार्याभावः) कार्य का अभाव होता है ॥ अन्य सामग्री के होते हुवे भी जिस के अभाव में जो न हो सके वह उस का कारण (उपादान) होता है तथा वह स्वयं कार्य कहाता है, यह कार्यकारण का स्वरूप बताया गया अर्थात् यह निश्चल नियम है कि कारण के बिना कार्य नहीं हो सकता। कारण हो तभी कार्य हो सकता है। इस लिये जिस पूर्व वर्त्तमान पदार्थ के भाव से उत्तर भावी पदार्थ का भाव हो सके, वही पूर्ववृत्ति पदार्थ उस उत्तरवर्त्ती पदार्थ का कारण कहावेगा और