वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ें१ अध्याय २ आन्हिक २३ सूत्र १० । १२ और ११ के समान व्याख्यान है ॥ १६ ॥ अब सत्ता का एक होना सिद्ध करते हैं :- ४८-सदिति लिङ्गाऽविशेषाद्विशेषलिङ्गाभावाच्चैको भावः॥१७॥ इति प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ (सत् इति) "है" उस में (लिङ्गाऽविशेषात्) लिङ्ग के सामान्य से (च) और (विशेषलिङ्गाऽभावात्) विशेष का लिङ्ग न होने से (भावः) सत्ता (एकः) एक है ॥ जिस प्रकार सामान्यविशेषभावरहित सब द्रव्यों में द्रव्यत्व एक है, सब अनेक गुणों में गुणत्व एक है, सब कर्मों में कर्मत्व एक है, इसी प्रकार सब द्रव्यों, गुणों और कर्मों में भाव वा सत्ता एक है, क्योंकि "है" इतने में कोई विशेष का चिन्ह नहीं, । द्रव्य है, गुण है, कर्म है, इन सब उदाहरणों में "है=अस्ति" एक सा है, उस में विशेष का लिङ्ग कुछ नहीं ॥ १७ ॥ इस २ आन्हिक के विषय को बताने वाला यह नीचे लिखा श्लोक वैदिक वृत्ति से उद्धृत किया जाता है जो सब पाठकों को उपयोगी होगा कि- कार्यकारणयोर्ज्ञानं सामान्यार्थस्य लक्षणम् । परीक्षणं च संक्षेपाद्द्वितीयेऽस्मिन्प्रकीर्त्तितम् ॥ १ ॥ कार्य और कारण का ज्ञान, सामान्य अर्थ का लक्षण और संक्षेप से परीक्षा; इस द्वितीय (आन्हिक) में कही गई ॥ १ ॥ इति प्रथमाऽध्याये द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥ इति श्री तुलसीरामस्वामिकृते वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥