वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयाऽध्याय १ आह्निक २७ और भी हेतु हैं कि जिन से वायु का द्रव्यत्व पाया जाता है। यथा- ६०-क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वाच्च ॥ १२ ॥ (क्रियावत्त्वात्) क्रियावान् होने (च) और (गुणवत्त्वात्) गुणवान् होने से ॥ सूत्र १५ में द्रव्य का लक्षण करते हुये कह आये हैं कि क्रियावान् और गुणवान् द्रव्य होता है, तदनुसार वायु भी क्रियावान् और गुणवान् होने से द्रव्य ही है, कोई अन्य पदार्थ नहीं ॥ १२ ॥ यदि वायु द्रव्य भी है तौ भी इस को नित्यत्व क्यों कहा है, पृथिवी जलादि के समान अनित्यता क्यों नहीं ? उत्तर- ६१-अद्रव्यत्वेन नित्यत्वमुक्तम् ॥ १३ ॥ (अद्रव्यत्वेन) द्रव्यवाला न होने से (नित्यत्वम्) नित्यता (उक्तम्) कही गई ॥ लोकव्यवहार में वायु को नित्य इस कारण से कहा गया है कि वायु का कारण अन्य द्रव्य देखा नहीं जाता । यह नित्यता वास्तविक नित्यता तौ नहीं है, किन्तु व्यवहार ऐसा है ॥ १३ ॥ वायु एक है वा अनेक ? उत्तर- ६२-वायोर्वायुसंमूर्च्छनं नानात्वे लिङ्गम् ॥ १४ ॥ (वायोः) वायु से (वायुसंमूर्च्छनं) वायु की टक्कर (नानात्वे) अनेक होने में (लिङ्गम्) पहचान है ॥ यदि वायु एक होता तौ वायु से वायु की टक्कर न होती, वायु के बबूले न उठते । उठते हैं, इस से जाना जाता है कि वायु अनेक हैं । उन में एक तौ सूक्ष्म तथा अल्प वायु पृथिवी के चारों ओर लिपटा है, जिस से पृथिवीस्थ प्राणी श्वास लेकर जीवित रहते हैं, दूसरे जो पूर्व से पश्चिम वा दक्षिण वा उत्तरादि दिशा विदिशाओं में घूमते फिरते हैं । हम सदा एकसा स्पर्श (दबाव) अपने ऊपर होने से उस साधारण वायु का अनुभव नहीं कर पाते, जो हमारा जीवन है, केवल पूर्व पश्चिमादि वायुवों को आपामर सब जानते हैं ॥१४॥ ६३-वायुसंनिकर्षे प्रत्यक्षाऽभावाद् दृष्टं लिङ्गं न विद्यते ॥ १५ ॥ (वायुसंनिकर्षे) वायु के सामीप्य में (प्रत्यक्षाऽभावात्) प्रत्यक्ष न होने से (दृष्टं) दृष्ट (लिङ्गम्) चिन्ह (न) नहीं (विद्यते) है ॥