वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंव्यावहारिक ज्ञान, काल के लिङ्ग हैं, अर्थात् इन से काल पहचाना जाता है ॥ जिस की अपेक्षा से एक पुरुष को बालक, दूसरे को युवा, तीसरे को वृद्ध कहते हैं, सूर्य के उदय अस्त जिस के जन्म से लेकर न्यून बीते हैं, वह बालक, उस से अधिक बार जिस के सामने सूर्योदय और सूर्यास्त हो चुके, वह युवा, उस से भी अधिक बार उदयाऽस्त वाला वृद्ध कहाता है, बस जिस को लक्ष्य करके यह न्यूनाधिक व्यवस्था होती है, वह काल पदार्थ है । यदि कालकृत अन्तर वा फ़रक न हो तो युवा को वृद्ध वा वृद्ध को बालक क्यों नहीं समझ लिया जाता, काल ही है जो इन में अपने सम्बन्ध से अन्तर कराता है ॥ पृथिवी आदि ५ महाभूतों से पृथक् ही काल पदार्थ हुवा । क्योंकि पहिले, पीछे, एक साथ, शीघ्र, देर से, यह व्यवहार पृथिवी में नहीं होता, न जल में, न तेज में, न अन्य किसी द्रव्य में, इस लिये इन से पृथक् काल एक द्रव्यान्तर है, जो पदार्थ पृथिवी आदि से भिन्न है, अचेतन होने से आत्मा से भी भिन्न है, जो बूढ़े वा जवानों के देहों और सूर्य से संसर्ग करके अपनी साथी संयुक्त और संयोग स्वरूप समीपता से वा अपने से संयुक्त समवाय स्वरूप समीपता से सूर्योदयाऽस्तादि को बूढ़े वा जवानों के देहों से संबद्ध करता है, वही द्रव्य " काल " कहाता है । इसी से वरे परे देर से वा शीघ्र, इत्यादि प्रतीतियों को काल का लिङ्ग कहा गया है ॥ देशकृत वरे, परे होना, इस कालकृत वरे परे इत्यादि प्रत्यय से विलक्षण है । देशकृत अधिक परत्व को " दूर " कहते हैं । कालकृत अधिक परत्व को " चिर वा देर " कहते हैं । दूर और चिर के अर्थ में जो अन्तर है, वही देश और काल के लिङ्गों की विलक्षणता है । ॥ लोग देखते हैं कि कोई क्रिया मेरठ में हो रही है, और उसी समय वही क्रिया कलकत्ते में हो रही है, तब कालकृत संबन्ध तो दोनों स्थानों में युगपत ( एक साथ ) है, परन्तु देशकृत संबन्ध एक नहीं । मेरठ से कलकत्ता दूर समझा ही जाता है, परन्तु मेरठ में होने वाली क्रिया और कलकत्ते में होने वाली क्रिया जिस एक द्रव्य से संबद्ध हुई वह काल है ॥ ६ ॥ यदि कहो कि ऊपर के सूत्रव्याख्यान से काल कोई पदार्थ होना तो पाया गया, परन्तु उस का नित्य होना और द्रव्य होना कैसे समझा जावे ? तो उत्तर- ८६-द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ७ ॥