वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५० वैशेषिकदर्शन - भाषानुवाद हम देखते हैं कि घट पटादि पदार्थों के जानने में यद्यपि दीपक वा सूर्यादि का प्रकाश भी कारण है तथापि कोई नहीं कह सकता कि सूर्यादि का प्रकाश द्रष्टा है, किन्तु साधन मात्र है। इसी प्रकार रूपादि ज्ञान का आश्रय शरीर होने पर भी ज्ञान का समवायि कारण शरीर नहीं, किन्तु उस से भिन्न आत्मा है ॥ ३ ॥ क्योंकि- १२०-कारणाऽज्ञानात् ॥ ४ ॥ ( कारणाज्ञानात् ) कारण में ज्ञान न होने से ॥ शरीर ज्ञान का आश्रय ( समवायी कारण ) इस लिये नहीं हो सकता कि शरीर के कारण पञ्च तत्त्वों में ही ज्ञान नहीं, जब कारण में ज्ञान नहीं तब कार्य में कहां से हो सकता है ॥ ४ ॥ यदि कहो कि हम तो पञ्च भूतों में ज्ञान मानते हैं, तल्लिङ्ग आत्मा को क्यों मानें ? तो उत्तर- १२१-कार्येषु ज्ञानात् ॥ ५ ॥ (कार्येषु) घट पटादि पञ्चभूतकार्यों में (ज्ञानात्) ज्ञान होना चाहिये था। यदि पञ्चतत्त्व चेतन होते तौ उन का कार्य समस्त घट पट मठ मन्दि सब चेतन ज्ञानी होता, जड़ कोई होता ही नहीं, परन्तु ऐसा नहीं पाया जाता, इस से पञ्च भूतों में ज्ञान मानना ठीक नहीं ॥ ५ ॥ प्रत्युत- १२२-अज्ञानाच्च ॥ ६ ॥ ( अज्ञानात् ) अज्ञान से ( च ) भी ॥ पञ्चतत्त्वों में अज्ञान का प्रमाण यह है कि उन के कार्य घट पटादि में को ज्ञान नहीं पाया जाता, अज्ञान देखा जाता है, इस से भी सिद्ध है कि पञ्चभूतों में ज्ञान है, न उन के कार्य घट पटादि में है, न शरीर में हो सकता है, किन्तु ज्ञान का आश्रय तौ आत्मा है, जो शरीरादि से व्यतिरिक्त है। इस विषय की पुष्टि समान तन्त्र न्यायदर्शन ३ । १ । १-१५ तक सू में किस प्रकार की गई है, सो पाठकों के अ वलोकनार्थ नीचे लिखते हैं:- “ दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात् ॥ न्यायद० ॥१॥ उत्तरपक्ष-दर्शन और स्पर्शन से एक ही अर्थ का ग्रहण होने से (आत्मा देहादि से भिन्न है ) ॥