वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्याय १ आह्निक ६३
१३५-आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षाद्यन्निष्पद्यते तदन्यत् ॥ १८ ॥ (आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षात्) आत्मा इन्द्रिय और अर्थ=विषयों के समीप होने से (यत्) जो (निष्पद्यते) सिद्ध होता है, (तत्) वह (अन्यत्) अन्य है ॥ जीवात्मा नित्य है, उस का गुण ज्ञान भी नित्य है, परन्तु इन्द्रियों और अर्थों के संयोग से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह जन्य है, नित्य नहीं, इस लिये आत्मा के स्वरूपगत ज्ञान से इन्द्रियद्वाराऽनुभूत ज्ञान पृथक् है । इस सूत्र पर यदि शङ्कराचार्यादि ने उपहास किया है तो वह उन्हीं के (ज्ञोऽत एव । वेदान्तद० २ । ३ । १८) सूत्रभाष्य का उपहासकारक है । जीवात्मा समस्त श्रुति स्मृति और दर्शन शास्त्रों ने चेतन और अनेक माने हैं । न केवल एक । इस विषय में पं० धारेश्वर जी के संग्रह को देखिये जिसे हम यहां उद्धृत करके पाठकों का उपकार होना समझते हैं । यथा- अणुरेव वै जीवोऽपरिसंख्येयश्च तद्भेदः । तदेतद् गम्यते- "वयं नमो अरन्त एमसि", "वयं स्याम पतयो रयीणाम्", "उद्वयं...अगन्म ज्योतिरुत्तमम्", "अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्", "यद्भद्रं तन्न आसुव", "स नः पितेव सूनवे...सचस्वा नः स्वस्तये", "वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियमैधा ऋषयो नाथमानाः । अपध्वान्तमूर्- र्णुहि पूर्षि चक्षुर्मुमुग्धि अस्मान् निधयेव बद्धान् ॥", "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि", "समानी व आकूतिः.... यथा वः सुसहासति", "असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः । तांस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनोजनाः" इत्यादिपरःसहस्रवेदमन्त्रगतजीवात्म- परकबहुवचनप्रयोगगतिमत्त्ववचनतः । एतेषु खलु जीवानां