वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३ न्याय्कन्दली न्यायः । कथं तर्हि सामान्येषु प्रत्ययानुवृत्तिः, सामान्यं सामान्यमिति ? अनेक- व्यक्तिसमवायोपाधिवशाद् विशेषेष्वप्येकशब्दप्रवृत्तिः, अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिजनकत्वस्य सर्वत्र सम्भवात् । नित्यत्वं विनाशरहितत्वम्, तदपि सामान्यस्य व्यक्त्युत्पादविनाशयो- रवस्थितिग्राहिणा भूयो भूयः प्रवृत्तेन निरुपाधिप्रत्यक्षेण व्याप्तिवन्निश्चीयते । समवायस्य तु सर्वत्र कार्योपलम्भादकृतकत्वाच्चानुमीयते । अर्थशब्दानभिधेयत्वञ्चेति । स्वसमयार्थशब्दान- भिधेयत्वं चैतेषां साधर्म्यम् । चः समुच्चये । चुके हैं । (प्र.) फिर सभी सामान्यों में 'ये सामान्य हैं' इस एक आकार की प्रतीति (अनुवृत्तिप्रत्यय) क्यों होती है ? (उ.) सभी सामान्य अनेक व्यक्तियों में रहते हैं, अतः यह "अनेक व्यक्तियों में रहना या अनेक व्यक्तिवृत्तित्व" रूप एक उपाधि सभी सामान्यों में है । इसी अनेक व्यक्तिवृत्तित्व-रूप उपाधि के कारण सभी सामान्यों में उक्त एक आकार की प्रतीति होती है । सभी विशेषों में भी 'ये विशेष हैं' इस एक आकार की प्रतीति होती है । इसके लिए भी विशेषत्व नाम के सामान्य का मानना आवश्यक नहीं है; क्योंकि सभी विशेषों में जो अपने-अपने आश्रय को विभिन्न पदार्थों से विलक्षण रूप से समझाने की क्षमता है, उसी क्षमता रूप एक उपाधि के बल से ही उक्त एकाकार की प्रतीति की उपपत्ति हो जाएगी । 'नित्यत्व' शब्द का अर्थ है विनाशरहित होना । यह (नित्यत्व) भी व्यक्तियों की उत्पत्ति से पहले और उनके नाश के बाद भी सामान्यों की वर्त्तमानता का ज्ञापक उनमें बार-बार प्रवृत्त प्रत्यक्ष प्रमाण से ही व्याप्ति की तरह ज्ञात होता है । समवाय से सभी स्थलों में (सभी कालों में) कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है, एवं समवाय किसी भी कारण से उत्पन्न हुआ नहीं दीखता है । इन्हीं दोनों हेतुओं से समवाय में नित्यत्व का अनुमान होता है । 'अर्थशब्दानभिधेयत्वञ्च' अर्थात् वैशेषिक शास्त्र में बिना विशेषण के केवल 'अर्थ' शब्द से द्रव्य, गुण, कर्म्म इन तीनों के ही समझने का एक सङ्केत है । तदनुसार उक्त 'अर्थ' शब्द का अभिधावृत्ति द्वारा न समझा जाना भी सामान्यादि तीनों का साधर्म्य है । 'च' शब्द समुच्चय अर्थ का बोधक है । 'सामान्यत्व' भी सामान्य ही होगा । यह सामान्यत्वरूप सामान्य द्रव्यादि पहले से स्वीकृत सामान्यों में तो रहेगा, किन्तु स्वाभिन्न सामान्यत्वरूप सामान्य में नही रहेगा; क्योंकि एक वस्तु में आधाराधेयभाव असम्भव है, अतः पूर्वस्वीकृत द्रव्यादि सामान्य एवं अधुना स्वीकृत सामान्यत्वरूप सामान्य एतत्साधारण एक दूसरे सामान्यत्व की कल्पना करनी पड़ेगी । इस प्रकार अनन्त सामान्यत्वों की कभी समाप्त न होनेवाली कल्पना की धारा चलेगी । यही अनवस्था है ।