वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ प्रशस्तपादभाष्यम् केवल वेद ही धर्मरूप क्रिया-कलाप के ज्ञापक हेतु हैं; किन्तु इन क्षणिक क्रियाकलापों को स्वर्गादि कालपर्यन्त रहने की सम्भावना नहीं है, अतः मध्यवर्ती एक अतीन्द्रिय अपूर्व की कल्पना मीमांसक भी करते हैं। वैशेषिकगण इस अपूर्व को ही धर्म कहते हैं । यह 'धर्म' केवल अनुमान से ही समझा जा सकता है । अतः जिस प्रकार मीमांसकों ने यागादि कर्मकलाप रूप धर्म के ज्ञापक प्रमाण रूप वेदों के अर्थ के निर्णय में ही अपना सारा श्रम व्यय किया है, उसी प्रकार अगर वैशेषिकगण आत्मनिष्ठ उक्त अपूर्व रूप गुण के एकमात्र साधक अनुमान और आवश्यक पदार्थ निरूपण के प्रसङ्ग में अधिक जागरूक हों, तो उनके ऊपर प्रतिज्ञात अर्थ से असम्बद्ध अर्थ के अभिधान का दोष नहीं मढ़ा जा सकता । दूसरी बात यह है कि अगर वैशेषिक दर्शन के उपक्रमस्थ धर्म शब्द से भी यागादि क्रियाकलापों को ही लें, तथापि द्रव्यादि के निरूपण को यागादि से सर्वथा असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता । हेतु दो प्रकार के होते हैं- एक ज्ञापक और दूसरा उत्पादक । दण्ड घट का उत्पादक कारण है और धूम वह्नि का ज्ञापक कारण है । इसी कारणत्वसाम्य से दोनों प्रकार के हेतु-बोधक पदों से हेतु में पञ्चमी विभक्ति होती है, जैसे- 'दण्डाद् घटः, धूमाद् वह्निः' इत्यादि । प्रकृत में विधिवाक्य रूप वेद धर्म के ज्ञापक कारण हैं और द्रव्यादि पदार्थ उनके उत्पादक कारण हैं; क्योंकि व्रीहि प्रभृति द्रव्य, आरुण्यादि गुण, उत्पवन अवहननादि कर्म, ब्राह्मणत्वादि सामान्य, इन सबों को मीमांसाशास्त्र में भी यागादि का सम्पादक माना गया है । इसी प्रकार इनके तत्त्वज्ञान में सहायक विशेष और समवाय का तत्त्वज्ञान भी परम्परया याग में उपकारक है फिर धर्म-व्याख्या के प्रसङ्ग में द्रव्यादि पदार्थों के निरूपण करनेवालों को सागर जाने की इच्छा से हिमालय जानेवालों की उपमा देना कहाँ तक उचित है ? इस दर्शन के ऊपर सबसे अधिक प्रहार हुये हैं और हो रहे हैं, अपने यूथ के दार्शनिकों द्वारा और त्रयीबाह्य बौद्धादि के द्वारा भी; किन्तु ये सभी विरोधी इस शास्त्र के प्रसङ्ग में आचार्य महर्षि प्रशस्तपाद को ही सब से प्रामाणिक व्याख्याता रूप में मानते चले आ रहे हैं । अतः प्रशस्तपादभाष्य का महत्त्व तो निर्विवाद है । तब रही बात यह भाष्य है ? या स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थ है ? इस प्रसङ्ग में 'सूत्रार्थों वर्ण्यते येन' भाष्य का यह लक्षण पूर्व रूप से संघटित न होने के कारण ही विवाद उपस्थित होता है; किन्तु यह भी ध्यान देने की बात है कि इस दर्शन में या और दर्शनों में भी स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थों की कमी नहीं है । उन सभी के ऊपर दृष्टिपात करने पर प्रशस्तपाद भाष्य को स्वतन्त्र निबन्ध मानने में भी कुछ कठिनाई होती है; क्योंकि इस ग्रन्थ में जिस प्रकार अपने सभी मन्तव्यों को प्रतिपद सूत्र के द्वारा प्रतिपन्न करने की चेष्टा की गई है, वैसी चेष्टा और स्वतन्त्र