भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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१० प्रशस्तपादभाष्यम् आत्मतत्त्व ज्ञान को ही मोक्ष का कारण माना गया है; किन्तु आत्मा को अच्छी तरह समझने के लिये भी संसार के और सभी पदार्थों को समझना आवश्यक है । अपने सहधर्मियों से और विरुद्धधर्मियों से विविक्त होकर किसी व्यक्ति को समझे बिना उसका तत्त्व समझना सम्भव नहीं है । संसारकी प्रत्येक वस्तु अन्य सभी वस्तुओं के साथ किसी न किसी प्रकार सादृश्य या वैसादृश्य से युक्त हैं, अतः परस्पर सम्बद्ध हैं । अतः एक वस्तु को समझने के लिये और सभी वस्तुओं को भी समझना आवश्यक है । सुतराम् आत्मा को समझने के लिये भी संसार की अन्य सभी वस्तुओं को समझना आवश्यक है; किन्तु संसार की असंख्य वस्तुओं को अलग-अलग प्रत्येकशः समझना साधारणजनों के लिये सम्भव नहीं है । अतः महर्षि कणाद ने समझने की सुविधा के लिये जगत् को द्रव्यादि सात भागों में विभक्त किया है । फलतः इनके मत से संसार की सभी वस्तुयें द्रव्यादि सात पदार्थों में से ही कोई हो सकती हैं । द्रव्य द्रव्य उसे कहते हैं जिसमें गुण हो या क्रिया हो । इसका यह अर्थ नहीं कि सभी द्रव्यों में सभी अवस्थाओं में गुण या कर्म रहते ही हैं; क्योंकि उत्पत्ति के समय उत्पत्तिशील पृथिव्यादि द्रव्यों में भी गुण या कर्म नहीं रहते । गुण और कर्म का समवायिकारण आश्रयीभूत द्रव्य ही हैं, जो अपनी उत्पत्ति से पहले नहीं रह सकता । अतः उत्पत्ति के समय द्रव्य बिना गुण या बिना कर्म के ही रहते हैं । उत्पत्ति के बाद उनमें गुण या क्रिया की उत्पत्ति होती है । आकाशादि विभु-द्रव्यों में तो क्रियायें कभी रहती ही नहीं । अतः 'गुण या क्रिया से युक्त जो पदार्थ वही द्रव्य है' इस लक्षण का अर्थ इतना ही है कि गुण और कर्म द्रव्यों में ही रहते हैं, द्रव्य से भिन्न गुणादि में नहीं । वस्तुतः 'द्रव्यत्व' जाति ही द्रव्य का लक्षण है । यह द्रव्यत्व जाति कहाँ रहती है ? इसको समझाने के लिए ही कर्म का, विशेषतः गुण का सहारा लिया जाता है । विभिन्न व्यक्तियों को किसी एक रूप से समझने के लिए उन सभी व्यक्तियों में किसी सादृश्य की की आवश्यकता होती है । सभी मनुष्य परस्पर भिन्न हैं, किन्तु ठीक एक ही आकार के दो मनुष्य नहीं मिल सकते; किन्तु सभी मनुष्यों में कुछ आन्तर और बाह्य सादृश्य भी हैं, जिनके चलते सभी मनुष्यों में 'यह मनुष्य है' इस एक तरह का व्यवहार होता है । इस प्रकार जिन सभी द्रव्यों में 'यह द्रव्य है' इस प्रकार का व्यवहार होता है, उन सभी द्रव्यों में कोई सादृश्य अवश्य ही होना चाहिए, इस सादृश्य के लिये संयोग और विभाग नाम के गुण को आचार्यों ने उपस्थित किया है । संयोग सभी द्रव्यों में समान रूप से रहनेवाला गुण है और