वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी- प्रशस्तपादभाष्यम् शरीरं द्विविधं योनिजमयोनिनञ्च । तत्रायोनिजमनपेक्ष्य शुक्रशोणितं देवर्षीणां शरीरं धर्मविशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायते। क्षुद्रजन्तूनां यातनाशरीराण्य- धर्मविशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायन्ते । शुक्रशोणितसन्निपातजं योनिजम् । तद् द्विविधम् जरायुजमण्डजञ्च । मानुषपशुमृगाणां जरायुजम् । पक्षिसरीसृपाणा- मण्डजम् । इनमें शरीर १.योनिज और २. अयोनिज भेद से दो प्रकार का है । इनमें एक प्रकार के अयोनिज शरीर देवताओं और ऋषियों के हैं, जो शुक्र और शोणित की अपेक्षा न रखकर विशेश प्रकार के धर्म और परमाणुओं से ही उत्पन्न होते हैं । (दूसरे प्रकार के) अयोनिज शरीर (मशकादि) क्षुद्र जीवों के हैं जो (शुक-शोणित की अपेक्षा न रखकर) अधर्म एवं परमाणुओं से उत्पन्न होते हैं । शुक्र और शोणित के संयोग से उत्पन्न शरीर को ही 'योनिज शरीर' कहते हैं । योनिज शरीर भी १. जरायुज और २. अण्डज भेद से दो प्रकार का है । मनुष्य, पशु एवं मृगादि के शरीर 'जरायुज' हैं एवं चिड़ियों और साँप प्रभृति जीवों के शरीर 'अण्डज' हैं । न्यायकन्दली कार्यान्तरं त्वस्याः समुच्चिनोति-त्रिविधमिति । कार्यत्रैविध्यमेव दर्शयति- शरीरेत्यादि । शरीरमिन्द्रियं विषय इति संज्ञा यस्य कार्यस्य तत्तथा । भोक्तुर्भोगायतनं शरीरम्, मृतशरीरे तद्योग्यत्वात् तद्व्यपदेशः । शरीराश्रयं ज्ञातुरपरोक्षप्रतीतिसाधनं द्रव्यमिन्द्रियम् । शरीरेन्द्रियव्यतिरिक्तमात्मनोभोगसाधनं द्रव्यं विषयः । शरीरभेदं कथयति-योनिजमयोनिनञ्चेति । शुक्रशोणितसन्निपातो योनिः, तस्माज्जातं योनिजम्, तद्विपरीतमयोनिजम् । तदेव दर्शयति-तत्रायोनिजमिति । तयोर्योनिजायोनिजयो- पृथिवी के और कार्यों का सङ्कलन 'शरीर' इत्यादि से करते हैं । अर्थात् शरीर, इन्द्रिय और विषय ये तीन नाम जिनके हैं वे ही 'शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञक' हैं । भोग करनेवाला (जीव) जिस आश्रय में भोग करे वही 'शरीर' है । मृत शरीर में भोग की योग्यता न होने के कारण शरीरत्व का व्यवहार नहीं होता है । शरीर में रहनेवाला एवं जीव के अपरोक्ष ज्ञान का सम्पादक द्रव्य ही इन्द्रिय है । शरीर और इन्द्रिय को छोड़कर जीवों के भोग के सम्पादक जितने द्रव्य हैं वे सभी 'विषय' हैं । 'योनिजमयोनिजञ्च' इत्यादि से शरीर का भेद दिखलाते हैं । प्रकृत में 'योनि' शब्द का अर्थ है शुक्र और शोणित का मेल । उससे उत्पन्न होनेवाले 'योनिज' कहलाते हैं, एवं इसके विपरीत जो कार्य शुक्र और शोणित के मेल के बिना ही उत्पन्न होता है, उसे 'अयोनिज' कहते हैं । इस अर्थ को 'तत्रायोनिजम्' इत्यादि वाक्य से समझाते हैं ।