वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी- न्यायकन्दली ग्राहकप्रमाणान्तरविरोधादनुपपन्नस्तद्वदयोनिजशरीराभ्युपगमोऽपि, नैवम्, शुक्रादिनिरपेक्ष- स्यापि शलभादिशरीरस्य दर्शनात् । विशिष्टसंस्थानस्य शरीरस्य शुक्रादिपूर्वतावगतेति चेत् ? सत्यम्, तथापि न नियमसिद्धिः, किमदृष्टविशेषाभावादस्मदादिशरीरस्य शुक्रादि- पूर्वता, किं वा विशिष्टसंस्थानमात्रानुबन्धकृतेति सन्देहात् । एतेन बाधकानुमानमपि पर्युद- स्तम्, तस्य व्याप्तिसन्देहात् । यच्चात्र वक्तव्यं तद्योगिप्रत्यक्षनिरूपणावसरे वक्ष्यामः । अधर्म्मविशेषेणाप्ययोनिजं शरीरं भवतीत्याह- क्षुद्रजन्तूनामिति । क्षुद्रजन्तवो दंशमश- कादयस्तेषां यातना पीडा दुःखमिति यावत्, तदर्थं शरीरं यातनाशरीरम् । तदधर्म- विशेष- सहितेभ्योऽणुभ्यो जायते । इदन्त्विह लोकसिद्धमेव । योनिजं शरीरमाह-शुक्रशोणितसन्नि- पातजमिति । शुक्रञ्च शोणितञ्च तयोः सन्निपातः संयोगविशेषः, तस्माज्जातं योनिज- देहोत्पत्ति से पहले नियमतः शुक्र-शोणित को देखने के कारण अयोनिज शरीर का मानना सम्भव नहीं है ? (उ.) नहीं, क्योंकि शुक्र और शोणित के बिना भी कीड़े-मकोड़े प्रभृति के अनेक शरीर देखे जाते हैं । (प्र.) फिर भी कुछ शरीर तो नियमतः शुक्र-शोणित से ही उत्पन्न होते हैं । (उ.) तब भी यह सन्देह रह ही जाता है कि जिन शरीरों की उत्पत्ति के पहले शुक्र-शोणित का संनिपात नियमतः देखा जाता है, उस (नियम) का कारण (शुक्र-शोणित निरपेक्ष शलभादि शरीर के सम्पादक अदृष्ट के सदृश) अदृष्ट का अभाव है । अथवा उस शरीर का ही यह स्वभाव है कि वह बिना शुक्र-शोणित के उत्पन्न ही न हो । तस्मात् यह नियम ही नहीं हो सकता कि सभी शरीर शुक्र और शोणित से ही उत्पन्न हों । इससे यह बाधक अनुमान भी खण्डित हो जाता है कि देवादि शरीर भी शुक्रशोणितपूर्वक हैं, क्योंकि वे भी विशेष आकार के हैं जैसे कि मनुष्य-शरीर; क्योंकि कथित युक्ति से इस अनुमान की व्याप्ति ही संदिग्ध है । इस विषय में और जो कुछ भी कहना है वह योगिप्रत्यक्ष के निरूपण में कहेंगे । 'क्षुद्रजन्तूनाम्' इत्यादि पङ्क्ति से कहते हैं कि विशेष प्रकार के अधर्म्म से भी अयोनिज शरीर की उत्पत्ति होती है । ये 'क्षुद्रजन्तु' हैं डांस, मच्छर प्रभृति । इनके शरीर 'यातनाशरीर' कहलाते हैं, 'यातना' शब्द का अर्थ है पीड़ा, दुःख । भोग करना ही जिस शरीर का प्रधान प्रयोजन हो, वही है 'यातनाशरीर' । वे विशेष प्रकार के अधर्मों से सहकृत परमाणुओं से ही उत्पन्न होते हैं । यह विषय आपामर प्रसिद्ध है । 'शुक्रशोणितसन्निपातजम्' इत्यादि से योनिज शरीर का निरूपण करते हैं । शुक्र और शोणित इन दोनों का जो 'सन्निवेश' अर्थात् विशेष प्रकार का संयोग, उस संयोग से 'जात' अर्थात् जन्म हो जिसका वही 'योनिज' शब्द से व्यवहृत होता है ।