वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०८ न्यायकन्दलीसंवेलितःप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म- प्रशस्तपादभाष्यम् तस्य गुणा बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्म्माधर्म्मसंस्कारसङ्ख्या- परिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः । आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्ध्यादयः १. बुद्धि, २. सुख, ३. दुःख, ४. इच्छा, ५. द्वेष, ६. प्रयत्न, ७. धर्म्म, ८. अधर्म्म, ९. संस्कार, १०. संख्या, ११. परिमाण, १२. पृथक्त्व, १३. संयोग और १४. विभाग ये चौदह गुण आत्मा के हैं । 'आत्मलिङ्गा- धिकार' अर्थात् 'प्राणापानादि' (३।२।४) सूत्र के द्वारा बुद्धि से प्रयत्नपर्यन्त न्यायकन्दली रेकः समानाधिकरणत्वाभावः, अहं पृथिव्यहमुदकमिति प्रयोगाभावात्, तस्मान्नायं पृथिव्यादिविषयः । ननु शरीरविषय एवायं दृश्यते स्थूलोऽहमिति ? न, अहं जानामि, अहं स्मरामीति प्रयोगात् । शरीरस्य च ज्ञानस्मृत्यधिकरणत्वं निषिद्धम्, तस्मा- दात्मोपकारकत्वेन लक्षणया शरीरे तस्य प्रयोगः, यथा भृत्येऽहमेवायमिति व्यपदेशः । एवं व्यवस्थिते सत्यात्मनो गुणान् कथयति- तस्य च गुणा इत्यादिना । बुद्ध्यादीना- मात्मनि सद्भावे सूत्रकारानुमतिं दर्शयति- आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ताः सिद्धा इति । आत्मलिङ्गाधिकार इति प्राणापानादिसूत्रं लक्षयति । धर्माधर्मावात्मान्तर- गुणानामकारणत्ववचनादिति । धर्म्माधर्म्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्वादिति वचनात्सिद्धौ । दातरि वर्त्तमानो दानधर्मः प्रतिग्रहीतरि अधर्मं जनयतीति कस्यचिन्मतं निषेद्धुं सूत्रकृतोक्तम्- (प्र.) 'अहम्' शब्द तो शरीर के लिए ही प्रयुक्त दिखता है, जैसे कि 'स्थूलोऽहम्' इत्यादि । (उ.) नहीं, "अहं जानामि, अहं स्मरामि" इत्यादि भी प्रयोग होते हैं । यह कह चुके हैं कि अनुभव और स्मृति शरीर के धर्म नहीं हैं, अतः शरीर चूँकि आत्मा को उपकार पहुँचाने वाला है, अतः आत्मा के वाचक 'अहम्' शब्द का लक्षणावृत्ति से शरीर में भी प्रयोग होता है, जैसे कि भृत्य में 'यह मैं ही हूँ' यह प्रयोग होता है । इस प्रकार आत्मा की सिद्धि हो जाने पर 'तस्य च गुणाः' इत्यादि से आत्मा के गुण कहे जाते हैं ! 'आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ताः सिद्धाः' इत्यादि से आत्मा में बुद्ध्यादि गुणों की सत्ता में सूत्रकार की अनुमति सूचित करते हैं । 'आत्मलिङ्गाधिकार' शब्द से 'प्राणापानादि' सूत्र सूचित होता है । 'धर्माधर्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्ववचनात्" अर्थात् "आत्मान्तरगुणानामात्मान्त- रेऽकारणत्वात्" (६।१।५) सूत्रकार की इस उक्ति से आत्मा में धर्म और अधर्म की सिद्धि समझनी चाहिए । किसी का कहना है कि दाता के दानजनित धर्म से ग्रहण करनेवाले पुरुष में अधर्म की उत्पत्ति होती है, इस मत का खण्डन करने के लिए सूत्रकार ने 'आत्मान्तरगुणानाम्' इत्यादि सूत्र लिखा है । इस सूत्र का अभिप्राय है कि जैसे कि एक आत्मा का धर्मरूप गुण